बुधवार, 13 सितंबर 2017

आदमी आज फ़िर मुस्कुराने लगा ।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

      फ़र्ज़ अपना  जहां मे निभाने  लगा ।
      आदमी आज फ़िर  मुस्कुराने लगा ।

      तोड़कर जाति धर्मों के बंधन सभी ।
      प्यार की लौ हृदय मे जलाने  लगा ।

      खा रहे एक थाली  मे  निर्धन  धनी ।
      कोई  रूठा  तो  कोई  मनाने  लगा ।

      पुत्र परिवार का  एक  सहारा  बना ।
      मां पिता के बचन वो  निभाने लगा ।

      हार   मे  जीत  मे  फ़ासले  न   रहे ।
      हौसला वो सभी  का  बढ़ाने  लगा ।

      आग़ बदले की भड़की थी संसार मे ।
      एकजुटता से  उसको  बुझाने  लगा ।

      मिल रही है ख़ुसी देख रकमिश तुझे ।
      अंधा  लूले  को  राहें  दिखाने  लगा ।

                           रकमिश सुल्तानपुरी

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