सोमवार, 13 जून 2022

नशा ए इश्क

ग़ज़ल 

 नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए । 
जमाने से मगर उलझा न जाए । 

 बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं, 
 कि मुझसे और अब देखा न जाए । 

 गरीबों की करो भरपूर सेवा , 
कहीं ये हाथ से मौक़ा न जाए । 

 जुनूँ ए इश्क़ से डरने लगा दिल , 
कहीं ये उम्रभर बढ़ता न जाए । 

 बड़ा खुदगर्ज़ निकला आदमी वो, 
उसे हरहाल में समझा न जाए । 

 हमेसा वक़्त की रफ्तार से चल , 
कभी भी वक़्त को रोका न जाए । 

 हुआ दीदार जबसे यार रकमिश, 
 कि मुझसे रातभर सोया न जाए । 


 -रकमिश सुल्तानपुरी

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...