ग़ज़ल।तेरी वफाई की कहानी भी ।।
जलेगा दिल जलाऊँगा मुहब्बत की निसानी भी ।
लिखूंगा आज मैं तेरी वफाई की कहानी भी ।।
मैं तेरे कमसिनी ख़ंजर के ज़ख़्मो को भुला बैठा ।
तुम्हे तो याद ही होगा मेरे आँखों का पानी भी ।।
मैं शातिर हूं या क़ातिल हूं खुदा हूं या गुनाहों का ।
यक़ीनन पड़ रही मुझको वही कीमत चुकानी भी ।।
सताता था मुझे हर पल तेरी खामोशियो का डर ।
दुनियां हो चुकी तेरी जवानी की दीवानी भी ।।
पलटकर देख़ जाते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।
तड़पकर रो रही होती तेरी यादें रूहानी भी ।।
नज़र ऐ जख़्म था गहरा चुभा नस्तर सा वो सदमा ।
मग़र बेशक मुझे थी वो मुहब्बत आजमानी भी ।।
रुलाया क्यों मुझे रकमिश सहारा गैर का पाकर ।
ताज़ी हो गयी यादें सदियों की पुरानी भी ।।
राम केश मिश्र "रकमिश"