बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।तेरी वफ़ाई की कहानी भी ।

ग़ज़ल।तेरी वफाई की कहानी भी ।।

जलेगा दिल जलाऊँगा मुहब्बत की निसानी भी ।
लिखूंगा आज मैं तेरी वफाई की कहानी भी ।।

मैं तेरे कमसिनी ख़ंजर के ज़ख़्मो को भुला बैठा ।
तुम्हे तो याद ही होगा मेरे आँखों का पानी भी ।।

मैं शातिर हूं या क़ातिल हूं खुदा हूं या गुनाहों का ।
यक़ीनन पड़ रही मुझको वही कीमत चुकानी भी ।।

सताता था मुझे हर पल तेरी खामोशियो का डर ।
दुनियां हो चुकी तेरी जवानी की दीवानी भी ।।

पलटकर देख़ जाते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।
तड़पकर रो रही होती तेरी यादें रूहानी भी ।।

नज़र ऐ जख़्म था गहरा चुभा नस्तर सा वो सदमा ।
मग़र बेशक मुझे थी वो मुहब्बत आजमानी भी ।। 

रुलाया क्यों मुझे रकमिश सहारा गैर का पाकर ।
ताज़ी हो गयी यादें सदियों की पुरानी भी ।।

                     राम केश मिश्र "रकमिश"

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत वो नही होती ।

       ग़ज़ल। मुहब्बत वो नही होती ।।

वफ़ा में इश्क़ में बंदिश इनायत वो नही होती ।
मिले जो मांगकर चाहत मुहब्बत वो नही होती ।।

किसे परवाह है दिल में झरोखा हो रहा कितना ।
कहे जो आँख के आँसू हक़ीक़त वो नही होती ।।

मिले जो रहनुमां बेशक़ इरादे नेक हो उसके ।
वही मज़बूर कर दे तो हिफ़ाजत वो नही होती है ।।

जरूरी है क़ि ज़ाहिर हो तुम्हारी ह्मवफ़ाई भी ।
दिलों में जख़्म कर जाये शरारत वो नही होती ।। 

वफ़ा में बदसलूकी से नतीज़े लाख़ हो बेहतर ।
गुनाहों में जो साज़िस हो मुरौव्वत वो नही होती ।। 

कफ़न का ख़ौफ़ है जिनको जिहादी वो नही होते । 
मिली जो मौत लालच में शहादत वो नही होती ।। 

लगाकर देख ले रकमिश" तेरा दिल टूट जाएगा ।
मिला चाहत के बदले जो नसीहत वो नही होती ।।

                                राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो ।।

          ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो।।

यकीं माने तो क्यों माने मुहब्बत आप करते हो ।
मुहब्बत वो नही जिसकी हिफ़ाजत आप करते हो ।।

तेरे जज़्बात तक मुझको बड़ी तकलीफ़ देते है ।
मुझे मालूम है बेशक़ शराफत आप करते हो ।। 

हुआ खुदगर्ज़ क्या मतलब ज़माने के दिलाशो से ।
मग़र जबतब ज़बाने की वक़ालत आप करते हो ।।

मुझे मंजूर का मतलब मुझको मत मिटा डालो ।
ग़मो में भी कमीनों सी शरारत आप करते हो ।।

आशिक़ हो सितमगर हो क़ातिल हो यक़ीनन तुम ।
दीवाने इस मेरे दिल पर हुक़ूमत आप करते हो ।।

अदाएं है अदाओं पर जो बंदिश हो तो कैसे हो ।
शकों पर बेवजह मुझसे नफ़ासत आप करते हो । ।

मुझे हर बार मिलती है सज़ा तेरे गुनाहों की ।
गवाही आँख भर देती ज़मानत आप करते हो ।। 

                            © राम केश मिश्र

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।कोई मुफ़लिस नज़र आया।


सजी महफ़िल दिवानों से मग़र गर्दिश नजर आया । ।
कोई मुल्ज़िम नज़र आया कोई मुफ़लिस नजर आया ।।

तकल्लुफ़ इश्क़ के दरम्यां हरारत की हवा बरपी ।
ख़ुदी की चाह पर बेशक़ वहा बंदिश नजर आया ।। 

हवाला दे रहे थे सब मेरी ही बदसलूकी का ।।
मेरा वो शक़ जताना ही उन्हें साज़िस नजर आया ।।

खिले सब चाँद से चेहरे कि जुल्फें चमचमाती थी ।
दिलों में कमसिनी थी पर उन्हें नरगिश नजर आया ।।

निगाहें चुन रही तन्हा किसी चेहरे की रौनक़ को ।
यक़ीनन शौक़ ऐ जलवा जवां आतिश नजर आया ।।

साबित था जुनूने-गम मग़र ग़ुमराह था रकमिश ।
मनाही इश्क़ की करता वही मुंसिफ़ नज़र आया ।।

                          ©© राम केश मिश्र

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।साहिलों पर दुश्मनो को आजमाने पड़ गये।

वक़्त की बंदिश रही वादे निभाने पड़ गये ।
दोस्ती भी न मिली रिस्ते भुलाने पड़ गये ।।

थी जरा मुश्क़िल मग़र मैं फूँक कर चलता रहा । 
बेवज़ह ही हमदिलों के दिल दुखाने पड़ गये ।।

जिंदगी खुद में पहेली सी मुझे लगने लगी थी ।
आँसुओ से ज़ख्म सारे फ़िर नहाने पड़ गये ।।

एक अर्से से सिसकता जी रहा था आज तक ।
दर्द के वो गीत फिर से गुनगुनाने पड़ गये ।।

माँग सकता था नही मै खुद खुदा से मिन्नते पर ।
आपके जज़्बात में खुद को झुकाने पड़  गये ।।

तुम मिले तो क्या मिले जो ख़ुसी थी मिट गयी ।
दर्द बन सैलाब उमड़ा आँसू बहाने पड़ गये ।।

सुन जरा रकमिश तुम्हारी दोस्ती में क्या मिला ।
साहिलों पर दुश्मनों को आजमाने पड़ गये ।।  

                        ©©राम केश मिश्र 'रकमिश'

शनिवार, 10 सितंबर 2016

ग़ज़ल।मैं अकेला कर रहा हूँ ।

  मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।

मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।
लोग जो हम उम्र है रच रहे इतिहास कोई ।।

है नही मंज़िल कोई पर चल रहा हूँ रात दिन ।
दर्द बुनता जा रहा हूँ उम्रभर अनायास कोई ।।

रास्ते तक भी नही पर रास्ते है खुद बनाने ।
लापता होकर हँसी का कर रहा एहसास कोई ।

ज़िंदगी का ये सलीक़ा याद तो मुझको रहेगा ।
दूरियाँ मुझको मिली पर आ सका न पास कोई । 

याद मुझको आ रहा है दोस्ती का वो तजुर्बा ।
जिंदगी में प्यार का तो है नही अभ्यास कोई ।।

मंजिलें तुमको मिलेगी फ़िक्र में रकमिश वफ़ा की ।
ख़त्म हो जायेगी ख्वाबो की कोई तालाश कोई ।।

                         ©©राम केश मिश्र

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ग़ज़ल।आइना आँख तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

ग़ज़ल ।आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

इरादे इश्क़ में बेसक दिले बंजर बना देगा ।
आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।।

बहेगा एक दिन तेरे जुदाई में गम-ए-आँसू ।
चुभेगा रात दिन जख़्मी कोई खंजर बना देगा ।।

लक़ीरें हाथ मत देख़ो भरोसा रख खुदाई पर ।
रहा ये प्यार जो सच्चा गमे मंज़र बना देगा ।।

करोगे लाख़ अब कोशिस न आऊँगा दुबारा मैं ।
नकामे इश्क़ इस दिल को कोई लंगर बना देगा ।।

बचूंगा खाक़ मैं मसलन तेरी तन्हाइयां अच्छी ।
जबाना तो तेरी नजरों को ही नश्तर बना देगा ।।

दुआओं से सुना है कि किस्मत भी बदलती है ।
साहिल तू बना रकमिश'समन्दर वो बना देगा ।।  

                           ©© राम केश मिश्र 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।।

वफ़ा के नाम पर बिल्कुल नफ़ासत अब नही होती ।
कोई दिल तोड़ जाये तो शिकायत अब नही होती ।।

मुझे मालुम है पत्थर दिल बनेगा एक दिन पानी ।
मग़र है दर्द का चस्का कि राहत अब नही होती ।।

मिलेगा एक दिन धोख़ा सभी मासूम चेहरों से  ।
छिपी नफ़रत गुमानी है कि चाहत अब नही होती ।।

निगाहों की गुज़ारिश में यहाँ बेदाग़ हर कोई । 
लगाकर तोड़ देते दिल शरारत अब नही होती ।।

सुबह से शाम तक मैंने बहाया था कभी आँसू ।
किसी की चाह में बेसक हिमाक़त अब नही होती ।।

यहाँ आँखों ही आँखों में बसी है रंजिसें हरपल ।
बिक़े या टूट जाये दिल नसीहत अब नही होती ।।

हुआ था ज़ख्म जो रकमिश' वही नासूर बन उभरा ।
करूँ मैं लाख़ क़ोशिश पर मुहब्बत अब नही होती ।

                              © राम केश मिश्र

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत मुझे जिंदगी से नही।

     ग़ज़ल।शिकायत मुझे जिंदगी से नही ।

मैं मिला हूँ मग़र आदमी से नही ।
शिक़ायत मुझे जिंदगी से  नही ।।

जीत लो सारी दुनिया मुझे गम नही ।
मग़र प्यार से दुश्मनी से नही ।।

एक अर्शे से तलाश जिनकी रही ।
पास आये मग़र तश्नगी से नही ।

तोड़  देते यहाँ लोग दिल साथियो ।
ज़ख्म मिलता मुझे अज़नबी से नही  ।।

दिल के बदले यहाँ सिर्फ दिल चाहिए ।
प्यार मिलता कभी बन्दगी से नही । 

तरसते मिले लोग बेजार है ।
दर्द सहते मगर ताजगी से नही ।।

बात उनसे  हुई तो मचलने लगे ।
पेश आये मग़र सादगी से नही ।। 

अँधेरा ही'रकमिश'सरेआम है ।
नफ़ासत मुझे रोशनी से नही ।।

                   राम केश मिश्र'रकमिश

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

दूरियों का जख़्म अब भरता नही ।
क्यों ज़मीं को आसमां मिलता नही ।।

ढल रही है उम्र बेसक बेखबर ।
चाह का सूरज कभी ढलता नही ।। 

प्यार है ये प्यार की दुश्वारियां ।
प्यार में ईमान तो मरता नही ।।

हो रहा रुसवा तुम्हारे प्यार में ।
ख़्वाब अक़्सर रात में बुनता नही ।। 

प्यार का मरहम खरीदा तुम करो ।
रंजिसों से घाव तो भरता नही ।।

बन रही है आँसुओं की झील इक ।
अश्क़ आँखों में कभी जलता नही ।।

गर्दिसों से दूर साहिल के लिए ।
आदमी खुदगर्ज़ है चलता नही ।। 

एक पौधा तू लगा विश्वास का ।।
बेखुदी में प्यार तो पलता नही ।।

वक्त की है बंदिसे 'रकमिश' मग़र ।
प्यार का उठता धुँआ बुझता नही ।। 

                   राम केश मिश्र'रकमिश'सुल्तानपुरी ।

बुधवार, 29 जून 2016

ग़ज़ल।करे जज़्बात की ख़िदमत वही इंसान होता है।

ग़ज़ल। करे जज़्बात की खिदमत वही इंसान होता है ।।

लगाकर तोड़ देना दिल बड़ा आसान होता है ।
करे जज़्बात की खिदमत वही इंसान होता है ।।

वफ़ा के नाम पर देखा मुझे साहिल मिला तन्हा ।
सच मे रास्ता सच का बड़ा सुनसान होता है ।।

लगाकर जान की बाज़ी यहा खुद भूल जाये जो ।
इमानत की नज़र में तो वही ईमान होता है ।।

बड़ी ही खुशनसीबी से कोई दिल को लुटाता है
बना रिस्ता खुदा का ही कोई फरमान होता है ।।

यहाँ कमसिन कमीनों के हुजूमो के ही जलवे है ।
ज़रा सी हमवफ़ाई पर बड़ा अभिमान होता है ।।

यहाँ हमआम से 'रकमिश' करेगा बेवफ़ाई जो ।
रहे वह उम्र भर ज़िंदा मग़र बेज़ान होता है ।।

             राम केश मिश्र'रकमिश'
        gajalsahil.blogspot.com

शनिवार, 18 जून 2016

ग़ज़ल।यहाँ सब दिल के सौदागर।

         ग़ज़ल।यहा सब दिल के सौदागर।

हुआ बदनाम है साहिल हिफ़ाजत कौन करता है ।
यहाँ सब दिल के सौदागर मुहब्बत कौन करता है ।।

लुटेरे रहनुमां निकले  वफ़ाई की नही हसरत ।
यहाँ झूठी हुक़ूमत की बग़ावत कौन करता है ।

लगे है बागवाँ करने रकीबों की ही पैमाइस ।
सजा बेज़ार है गुलशन हिमाक़त कौन करता है ।

तवज्जो मिल रही काफ़ी यहाँ बेशक़ गुनाहों को
निहायत बेगुनाहों की वक़ालत कौन करता है ।।

अदाओं में निगाहों में मिलेंगे प्यार के झांसे ।
यक़ीनन तोड़ जाते दिल शरारत कौन करता है ।।

सभी धोख़े की दुनिया है ज़रूरत कर रहे पूरी ।
मिला मौक़ा तो तन्हाई मुरौव्वत कौन करता है ।।

भरो न दर्द तुम'रकमिश'किसी मासूम चेहरे पर ।
ग़मो में डूबने की अब ज़रूरत कौन करता ह ।।

                          राम केश मिश्र'रकमिश'

शुक्रवार, 17 जून 2016

ग़ज़ल।ईशारों से समझ लेंगे।

           ग़ज़ल।इशारो से समझ लेंगे ।

झुकी नजरों की बेचैनी निखारों से समझ लेंगे ।
तेरे ख़ामोश अधरों को इशारों से समझ लेंगें ।।

ये मत समझो कि नाज़ुक़ मैं बेगाना हूँ दीवाना हूँ ।
दिले हालात ग़म रौनक़ बहारों से समझ लेंगें ।। 

क़ातिल है तुम्हारे भी शहर मे कुछ तेरे हमदम ।
मिलोगे जब कभी उनसे सहारों से समझ लेंगें ।।

यक़ीनन इश्क़ में बिखरे यहा जज़्बात हैं काफ़ी ।
बहे जो आँख में आंसू किनारों से समझ लेगें ।।

छुपाओ लाख़ तुम रंजिश करोगे क्या बहाना तुम ।
उठी नफ़रत की बेशक़ इन दीवारों से समझ लेगें ।

रहो ख़ामोश'रकमिश'तुम जुबां खोलो या न खोलो ।
तुम्हे कितनी मुहब्बत है विचारों से समझ लेंगें ।।

                    राम केश मिश्र'रकमिश, 

गुरुवार, 16 जून 2016

ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही।

    ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

बेजुबां बन सर कटाना है शहादत तो नही ।
ज़ालिमों सा मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

लाख़ हो बंदिश सज़ा ऐ मौत खुद हो सामने ।
बढ़ चलेगे शान से कुछ खूबसूरत तो नही ।।

चुपके चुपके चल रही है देश में कुछ साजिशें । 
काले धन पर ही नजर है ये हक़ीक़त तो नही ।?

बिक रहा है दौलतों से अब यहा ईमान देखो ।
घूस लेकर मुस्कुराना भी शराफ़त तो नही ।।

है छुपे गद्दार अपने देश में इनको निकालो ।
चुपके चुपके कर रहे होंगें हुकूमत तो नही ।?

साफ़ सुथरी नीति में आज भी धोख़ा छिपा है।
है बहुत अड़चन बदलने की जरूरत तो नही ।?

जाने दो'रकमिश'यहा के लोग है क़ायल बहुत ।
हो गयी है चलबाजों से मुहब्बत तो नही ।? ।

                  राम केश मिश्र'रकमिश'

ग़ज़ल।मेरी आदत तो नही।

          ग़ज़ल।ये मुहब्बत तो नही ।

आपसे बेहतर कोई भी खूबसूरत तो नही ।
तुम वफ़ा ही करोगे ये हक़ीक़त तो नही ।।

जिंदगी के मोड़ पर मिल गये तो क्या हुआ ।
ये महज़ इत्तफ़ाक़ है कोई मुहूरत तो नही ।।

देखकर तेरी शरारत बढ़ गयी खामोशियां ।
लम्हा लम्हा गमसुदा हूँ ये मुहब्बत तो नही ।।

बेरुख़ी से टूटकर खुद तन्हा तन्हा जी रहा हूँ ।
बेवज़ह दिल तोड़ने की अब ज़रूरत तो नही ।। 

हर किसी से दोस्ती ,प्यार दू मुमकिन कहाँ  ।
कर वफ़ा बदनाम कर दू मेरी आदत तो नही ।।

बड़ रहीं है बेसक मुहब्बत में तेरी फरमाइशें  ।
दिल के बदले यार मुझ पर ही हुकूमत तो नही ।।

है मुझे मंजूर 'रकमिश' गम भरी तनहाइयां । 
दर्द के झोंके सही कोई मिलावट तो नही ।। 

                          ©राम केश मिश्र'रकमिश' 

गीतिका।सबकुछ तमासा हो गया ।


    गीतिका।सब कुछ तमासा हो गया ।।

आदमी खुदगर्ज़ प्यासा हो गया ।
आजकल सब कुछ तमासा हो गया ।।

फ़र्ज की होती नही परवाह अब ।
घूस खाना अब बताशा हो गया ।।

प्यार में नस्तर चुभेंगे एक दिन ।
हैं यकीं दिल को दिलाशा हो गया ।

बढ़ रही रिस्तों में नफ़रत, दूरियाँ ।
देखकर ये दिल हताशा हो गया ।।

हो रहे क़ातिल यहाँ गुमनाम सब ।
बेगुनाहों का ख़ुलासा हो गया ।।

मौत के बदले यहा बस मौत है ।
जख़्म नाजुक या जरा सा हो गया ।।

है यहाँ कोमल सभी नापाक दिल ।
पाक दिल पर तो मुँहासा हो गया ।।

हर जुबाने ब्यंग्य रूपी बाण पैने ।
मुँह नही जैसे गड़ासा हो गया ।।

सोंच क्या होगा भला'रकमिश'तेरा ।
जख़्म तेरा तो तराशा हो गया ।। 

                   राम केश मिश्र'रकमिश'

बुधवार, 15 जून 2016

ग़ज़ल।तुम्हारे प्यार की दुनिया ।

ग़ज़ल।तुम्हारे प्यार क़ी दुनिया दिवानी अब नही होती।

अधूरे रह गये किस्से  कहानी अब नही होती ।
तुम्हारे प्यार की दुनिया दिवानी अब नही होती ।।

दिलों को तोड़कर बेसक दिया तुमने है तन्हाई ।
ज़लवा हुश्न में पागल शयानी अब नही होती ।।।

तुम्हें तो याद ही होगा तुम्हारा तो जबाना था ।
बेगाने हो रहे अपने जवानी अब नही होती ।। 

पता चल ही गया होगा तुम्हे भी अश्क़ की क़ीमत ।
निगाहें कातिलानी वो गुमानी अब नही होती ।। 

करोगे क्या वफ़ाई तुम मिली तुमको तो तन्हाई । 
जफ़ा में प्यार की क़ीमत चुकानी अब नही होती ।। 

मेरे ही सामने मसलन मेरे खत को जलाया था ।
तेरे नफ़रत की वो यांदें पुरानी अब नही होती ।। 

खुदा का फ़ैसला ही है अकेले रह गये "रकमिश" । 
कि तोहफ़े अब नही होतें निसानी अब नही होती ।।                         

                              राम केश मिश्र"रकमिश"

ग़ज़ल।मेरे एहसास की दुनिया।

       ग़ज़ल।मेरे एहसास की दुनिया।

चलो रश्मे मुहब्बत में निभाओ तो तुम्हे जाने ।
मेरे एहसास की दुनिया बसाओ तो तुम्हें जाने ।।

वही ज़ुल्फ़ों  की शाया है वही है झील सी आँखे ।
बेकाबू दिल की आहट को सुनाओ तो तुम्हे जाने ।।

पढ़ो तुम आज पैमाइस निग़ाहों की बेचैनी को ।
रहे न फ़ासला हरगिज़ मिटाओ तो तुम्हे जाने ।।

प्यास हूँ सितम ढाती तेरी ख़ामोश मदहोशी ।
लगी है आग़ जो दिल में बुझाओ तो तुम्हे जाने ।।

तड़पती रूह तन्हाई सम्हाली अब नही जाती ।
ज़रा आग़ोश में आकर समाओ तो तुम्हे जाने ।।

तेरे इन शुर्ख़ होठों पर लवों की बूंद सी आकर ।
सजी जामे मुहब्बत को पिलाओ तो तुम्हे जाने ।। 

दवा ऐ इश्क़ तो'रकमिश'ज़बाने में नही मिलती ।
वफ़ा ऐ इश्क़ में खुद को लुटाओ तो तुम्हे जाने ।।

                    राम केश मिश्र'रकमिश'

सोमवार, 13 जून 2016

ग़ज़ल।लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता।

  गज़ल। लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता ।।

यहा इंसान है कातिल वफ़ाई तो नही देता ।
लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता ।।

भरोसा हो गया देख़ो उसे अब बेहयायी पर ।
किये खुद के गुनाहों की सफ़ाई तो नही देता ।

लगी पाबंदियां क्यों है ज़बाने की मुहब्बत पर ।
ग़मो में दर्द की अक़्सर दवाई तो नही देता ।। 

रूहानी प्यार की चींखे उसने भी सुनी होंगी ।
पड़ा ख़ामोस, है तन्हा ,सुनाई तो नही देता ।।

लुटेरे कर रहे होते यहा जुल्मों की पैमाइस ।
अमन की चाह में बेशक़ गवाही तो नही देता ।।

वहसी है ,दरिन्दा है ,खुदा की भी नही चिंता ।
वफ़ा ऐ जख़्म के बदले दुहाई तो नही देता ।। 

बने नासूर है 'रकमिश'ज़ख्मो का जुनूं पाकर ।
आदत हो गयी अब तो दुखाई तो नही देता ।।

                           ©राम केश मिश्र'रकमिश'

रविवार, 12 जून 2016

ग़ज़ल।दिवाने को नही मालुम।

ग़ज़ल।निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।

वफ़ा में जख़्म पाया हूँ ज़बाने को नही मालुम ।
निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।।

नही होती मुहब्बत में यहा ज़ख्मो की भरपाई ।
मिली है ज़िंदगी किस पर लुटाने को नही मालुम ।

यक़ीनन नफ़रतों में भी उसे साज़िश लगी होगी ।
ग़मो में काम आयी हो भुलाने को नही मालूम ।।

हुआ जो दर्द तो आँखे छिपाकर क्या करें आंसू ।
मिला हो एक पहलू भी छिपाने को नही मालुम । 

जवां वो ,थी हसीं वो थी ,बसी वो थी निगाहो में ।
पर आयी हो कभी तन्हा मिटाने को नही मालुम ।।

मुझे तकलीफ़ तो न थी मग़र हालात से बेबस ।
चला आया तपिस का गम बुझाने को नही मालुम ।

मुझे मालूम था 'रकमिश' मुहब्बत भी बिकाऊ है ।
मग़र दर्दो के अफ़साने भुलाने को नही मालूम ।। 

                            © राम केश मिश्र'रकमिश'

गुरुवार, 9 जून 2016

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

रविवार, 5 जून 2016

ग़ज़ल।आशियाना मिल गया।

         ग़ज़ल।आशियाना मिल गया ।

आदमी को खुदा, खुद का ठिकाना मिल गया ।
फ़र्ज ,शिक़वे रह गये साहिल पुराना मिल गया । 

बेदख़ल होने लगा है अब वजूदे हुस्न से वह ।
सरज़मी के पार जाने का बहाना मिल गया ।।

आ रही थी बनके छाया रात हर दीदार करने ।
वक्त की बंदिश हटी मौका सुहाना मिल गया ।।

एकतरफ़ा प्यार से क़ायल रही जो उम्र भर ।
उम्र रूठी ,मौत को बेशक दीवाना मिल गया ।

दौलतों की शाने शौक़त हो गयी ख़ामोश देखो ।
लुट गया, खुद लूटकर सारा खज़ाना मिल गया ।।

आज तू ख़ामोश रोयेगा जबाना फ़र्क़ किसको ।
क़हक़हे दो चार दिन मातम मनाना मिल गया ।।

सो गये "रकमिश"न जाने लोग कितने शौक़ से । ।
जिंदगी को मौत का इक आशियाना मिल गया । 

                       रामकेश मिश्र"रकमिश"

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...