बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।तेरी वफ़ाई की कहानी भी ।

ग़ज़ल।तेरी वफाई की कहानी भी ।।

जलेगा दिल जलाऊँगा मुहब्बत की निसानी भी ।
लिखूंगा आज मैं तेरी वफाई की कहानी भी ।।

मैं तेरे कमसिनी ख़ंजर के ज़ख़्मो को भुला बैठा ।
तुम्हे तो याद ही होगा मेरे आँखों का पानी भी ।।

मैं शातिर हूं या क़ातिल हूं खुदा हूं या गुनाहों का ।
यक़ीनन पड़ रही मुझको वही कीमत चुकानी भी ।।

सताता था मुझे हर पल तेरी खामोशियो का डर ।
दुनियां हो चुकी तेरी जवानी की दीवानी भी ।।

पलटकर देख़ जाते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।
तड़पकर रो रही होती तेरी यादें रूहानी भी ।।

नज़र ऐ जख़्म था गहरा चुभा नस्तर सा वो सदमा ।
मग़र बेशक मुझे थी वो मुहब्बत आजमानी भी ।। 

रुलाया क्यों मुझे रकमिश सहारा गैर का पाकर ।
ताज़ी हो गयी यादें सदियों की पुरानी भी ।।

                     राम केश मिश्र "रकमिश"

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत वो नही होती ।

       ग़ज़ल। मुहब्बत वो नही होती ।।

वफ़ा में इश्क़ में बंदिश इनायत वो नही होती ।
मिले जो मांगकर चाहत मुहब्बत वो नही होती ।।

किसे परवाह है दिल में झरोखा हो रहा कितना ।
कहे जो आँख के आँसू हक़ीक़त वो नही होती ।।

मिले जो रहनुमां बेशक़ इरादे नेक हो उसके ।
वही मज़बूर कर दे तो हिफ़ाजत वो नही होती है ।।

जरूरी है क़ि ज़ाहिर हो तुम्हारी ह्मवफ़ाई भी ।
दिलों में जख़्म कर जाये शरारत वो नही होती ।। 

वफ़ा में बदसलूकी से नतीज़े लाख़ हो बेहतर ।
गुनाहों में जो साज़िस हो मुरौव्वत वो नही होती ।। 

कफ़न का ख़ौफ़ है जिनको जिहादी वो नही होते । 
मिली जो मौत लालच में शहादत वो नही होती ।। 

लगाकर देख ले रकमिश" तेरा दिल टूट जाएगा ।
मिला चाहत के बदले जो नसीहत वो नही होती ।।

                                राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो ।।

          ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो।।

यकीं माने तो क्यों माने मुहब्बत आप करते हो ।
मुहब्बत वो नही जिसकी हिफ़ाजत आप करते हो ।।

तेरे जज़्बात तक मुझको बड़ी तकलीफ़ देते है ।
मुझे मालूम है बेशक़ शराफत आप करते हो ।। 

हुआ खुदगर्ज़ क्या मतलब ज़माने के दिलाशो से ।
मग़र जबतब ज़बाने की वक़ालत आप करते हो ।।

मुझे मंजूर का मतलब मुझको मत मिटा डालो ।
ग़मो में भी कमीनों सी शरारत आप करते हो ।।

आशिक़ हो सितमगर हो क़ातिल हो यक़ीनन तुम ।
दीवाने इस मेरे दिल पर हुक़ूमत आप करते हो ।।

अदाएं है अदाओं पर जो बंदिश हो तो कैसे हो ।
शकों पर बेवजह मुझसे नफ़ासत आप करते हो । ।

मुझे हर बार मिलती है सज़ा तेरे गुनाहों की ।
गवाही आँख भर देती ज़मानत आप करते हो ।। 

                            © राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

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