शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

तेज़ाब उभर आता है ।ग़ज़ल ।

     तेजाब उभर आता है ।ग़ज़ल

मैं तो खामोश हूँ पर जबाब उभर आता है  ।। 
बीते लम्हों का इक ख्वाब उभर आता है  ।।

अब जा, चली जा तू मेरी नजर से दूर कही ।।
तुझे देखूं तो दर्द का शैलाब उभर आता है ।।

बात तो बिल्कुल मत कर तू अपनी बेगुनाही की ।।
गुनेहगार मैं भी नही बेताब उभर आता है ।।

अब दहकते है शोले खुद व् खुद तन्हाइयो में ।
तू मिले तो आँखों में आफ़ताब उभर आता है ।।

माना कि तेरी यादो में जन्नत की झलक मिलती है ।
ख़ुशनुमा चेहरा वो गुलाब उभर आता है ।।

जो भी मिला सुकून बनकर तोड़ ही गया दिल ।
अब हर कोई बेवफा ज़नाब उभत आता है ।। 

जा चली जा रकमिश" हर हाल भुला देगा तुझे ।।
पर भूलने की चाह से तेज़ाब उभर आता है ।

                           ---R.K.MISHRA

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

      ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

ये दुनियां संगदिल निकली मुहब्बत क्यों नही करती ।
फ़रेबी है अपनेपन की दौलत पर नही मरती ।।

चलो तुमको दिखाते है दवाओ की दुकानों में ।
तड़पते लोग रहते है दवा उनको नही मिलती ।।

बने मज़दूर बच्चों पर तरस अब हम नही खाते ।
करे दिन रात मेहनत पर आह उनकी नही थमती ।। 

जहा देखो वही पर अब रिश्वत की वसूली है ।
न जाने शख्शियत क्या है जेब उनकी नही भरती ।

न जाने कौन सी मिट्टी से बने है लोग दुनिया के ।
भलाई की परत बेशक़ अब उनपे नही चढ़ती ।।

यहाँ पर प्यार के भी तो अज़ब किस्से कहानी हैं ।
हवस बढ़ती ही जाती है कली दिल की नही खिलती ।।

उजाला नाम दे देकर अँधेरा खूब बढ़ाते है ।
दीवाली रोज आती पर दिलों के तम नही  हरती ।।

यहाँ के लोग रोते है खुदी के दर्द से ग़ाफ़िल ।।
ख़ुशी की देखकर रकमिश" ख़ुशी उनको नही मिलती ।। 

                      ---- R.K.MISHRA

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

शेर . हक़ीक़त

           ।।शेर।।हकीकत।

माना की वक्त की कोई भी कीमत नही होती है ..
पर  उम्र के तजुर्बे भी बड़े नायाब होते हैं..

अब रहने भी दो इन ख्वाबो को ख्वाब ही ।
बहुत ही फर्क होता है सपनो और हकीकत में ।।

जहा देखो जिधर देखो वही हालात है सबके ।।
कोई दिल को जलाता है कोई दिल ही जला देता ।। 

कभी मौका मिले गर तो चले साहिल पर तुम आना ।
तुम्हारे गम से ज्यादा भी यहा ग़मगीन रहते है ।। 

अब तो डर लगने लगा है उनके शाये से भी ऐ दोस्त ।
कि कही इल्ज़ाम ऐ मुहब्बत न लगा बैठे वे ।।

                    ---R.K.MISHRA

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा .

      ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा।

क़द्र उसकी क्यों करें हम जिंदगी से जो है हारा ।
चल रहे है ठोकरों पर आज हम भी बेसहारा ।।

हारने का ये तो मतलब हैं नही क़ि टूट जाओ ।
टूटने के दर्द का तुम कुछ करो एहसास प्यारा । 

मिल सकेगी न कभी मंजिल उसे तुम मान लेना ।
जो निकल दरिया से भागा बुझदिलो सा कर किनारा ।।

उम्र भर जिसने न समझा उम्र की तरकीबिया को ।
उम्र ढल जायेगी उसकी क्या करेगा बन बेचारा ।।

ख़्वाब सपने जो सजायें चल उसे कर दे हक़ीक़त ।
वक़्त गुजरा न मिलेगा कल न लौटेगा दुबारा ।।

सोचने की उम्र तो अब है नही मेरे दोस्त रकमिश" ।
कब उड़ोगे हौसलों के पंख का लेकर सहारा ।।

                       ---R.K.MISHRA

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का मतलब तो है.

    ग़ज़ल .प्यार का मतलब तो है .

ये जिंदगी तेरे इस निखार का मतलब तो है ।।
देर से ही सही पर इस प्यार का मतलब तो है ।। 

बहारें लाख़ आयीं हो चमन भी मुस्कुराया हो ,
मग़र तपती दुपहरी में बौछार का मतलब तो है ।।

ग़मो की फ़िक्र क्या करना ग़मो की जिंदगी सारी ।
किसी की याद में तन्हा इंतजार का मतलब तो है ।। 

जरूरी है नही होना सभी का बेवफा हमदम ।
भरें हों आँख में आँशू तो इंकार का मतलब तो है ।।

लगाकर जान की बाज़ी तुम्हारे दिल को जीते जो ।
तुम्हारी शौक़ के आगे गया हो हार का मतलब तो है ।।

करे हम रोज़ कोशिस पर मिले जब न खुदा हमको ।
करो उम्मीद मत छोड़ो एतबार का मतलब तो है ।।

बेशक़ अदाओं की नुमाइस दिल बहला रही हो पर ।
किसी के रूप की चितवन दीदार का मतलब तो है ।। 

कभी तुम करके देखो ख़ुद खुले दिल से इबादत को ।
मिलेगी रब की जन्नत भी संसार का मतलब तो है ।।
                  

                         ----R.K.MISHRA

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।न तुझमे कमी है।

        ।गज़ल।न तुझमे कमी है ।।
    

वहाँ तेरे आँगन में महफ़िल जमी है ।
यहाँ मेरे दिल पर गमे रौशनी है ।।

भले आज तेरी नजर न उठे ये ।
जो चेहरे से हटकर जमी पे ज़मी है ।।

मग़र आज मुझको पता चल गया है ।।
यक़ीनन छटेगा ये गम मौसमी है ।।

बहेगी हवा कोई चाहत की गर तो ।
ढहेगा तेरा गम ये जो रेशमी है ।।

अग़र हौसला हो जरा आज कह दे ।।
न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है ।।

जरा पास आकरके आँखों में झांको ।।
पलको पे उभरी नमी ही नमी है ।।

अग़र पास में हो छिपा लेना वो खत ।। दिखाना न उसका यहा लाज़मी है ।।

असर हो रहा है ये गम के है लम्हे ।
ग़र तस्वीर तेरी दिल में थमी है ।।

चलो अब तो लब्जे जुबाँ से तो बोलो ।
न मैं मोम हूँ न तू कोई ममी है ।।

                     ......R.K.MISHRA
                       ***

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।हर मज़ा बेकार सा था।

    ।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स  गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

                           R.K.MISHRA

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

।।शेर।तकलीफ़।

     ।।शेर।। हकीकत।।

अब रहने भी दो इन ख्वाबो को ख्वाब ही ।
बहुत ही फर्क होता है सपनो और हकीकत में ।।

हक़ीक़त से हम बेपरवाह हो जाये तो भी कैसे ।
क्योकि स्वप्नों की तो कोई बुनियाद ही नही होती ।।

न पूंछो तो ही बेहतर उस एहसास  की दुनिया ।
वहा तस्वीर भी होती है और तकलीफ़ भी ।।

देख दुनिया के रंजोगम बड़ी तखलीफ होती है ।।
हौसले अब नही होते इरादे अब नही बनते ।

अब हमने भी तोड़ लिया ग़मो से नाता अपना ।।
आखिर दिल के हालात पर मातम मनाये कब तक ।।

हर बार मेरी चाहत में जफ़ा हो ही जाती है ।।
क्योकि खत्म हो जाती है तलाश सुरुआत से पहले ही ।।

                      ×××

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .

     .ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .
                             R.K.MISHRA

तुमने सजा रखा है जो ये प्यार का बाज़ार है .
ये डुबो देगा तुम्हे भी दिल तेरा गद्दार है .

तोड़ दिल को जो गये तुम वक्त से पहले मेरा .
प्यार के काबिल न छोड़ा हो गया बेकार है .

है पता तुमको नही क्या हुआ होगा यहा .
सर्द मौसम गम भरे अब अश्क़ की भरमार है .

सह अकेले मैं रहा हूँ दर्द की वो सलवटे .
ढल रही अब चांदनी चाँद भी लाचार है .

फ़िक्र मत कर बद्दुआये मैं कभी  दूँगा नही ..
पर तेरे इस संगदिल पर मेरा धिक्कार है .

रूप तेरा भी ढलेगा एक दिन तुम देख लेना .
फ़ैसला होकर रहेगा बस वक्त का आसार है..

                      ×××

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मुझे अब डर नही लगता.

       ग़ज़ल .मुझे भी डर लगता
                          R.K.MISHRA

अब तेरे बिन घर मेरा ये घर नही लगता .
अब अँधेरो से मुझे भी डर नही लगता .

आयेगी तू लौट कर मुझको अभी भी है यकीं .
बेबसी तब तक रहेगी पर नही लगता  .

रूप तेरा आ ही जाता है अँधेरी रात में .
चाँद सा चेहरा वो संगमरमर नही लगता .

तू जो थी तो जिंदगी भी चल रही थी साथ में .
अब जी सकूँगा एक पल अक्सर नही लगता .

उस नदी के पास जो तू एक दिन मुझसे मिली थी .
ढूढ़ता हूँ दरबदर पर वो दर नही लगता .

इन नतीज़ो की न माने तो मेरे इस दिल की सुन ले .
ये धड़कता है अभी पथ्थर नही लगता .

एक पौधा सींचता हूँ मैं मेरे इन आंशुओं से .
लाख़ चाहू पर अभी तो फर नही लगता .

ढह ही जायेंगे घरौंदे अश्क़ की बरसात से  .
बच सकेंगे प्यार के मंज़र नही लगता .

                     ×××

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

2.दिवाने याद रहते है .

    ।।ग़ज़ल।।दीवाने याद रहते है।।

तेरी नजरो की ख़ामोशी ,  तराने याद रहते है ..
लगे जब हम कभी तुमको मनाने याद रहते है..

भले खुद को लुटा दे तू हमारी शौक में हमदम .
मग़र वो दर्द के तेरे जबाने याद रहते है ...

बहुत कम फ़ासले थे पर कभी कोशिस न की तुमने ।।
न मिलने के तुम्हारे सब बहाने याद रहते है ।। 

हमारे दिल की राहो को तुम्हारा यूँ कुचल जाना .
नही अब जख्म होते पर पुराने याद रहते हैं ..

कभी आना तो देखोगे नही बाक़ी है तन्हाई ..
मग़र तेरे गम के मंजर के तराने याद रहते है ..

करो तुम लाख कोशिस पर मुझे न भूल पावोगे .
खुदा भूले तो भूले पर दीवाने याद रहते है ..

अभी भी वक्त है "रकमिश" इरादा हो चले आना ..
तेरे आगोश के लम्हे सुहाने याद रहते है .  .

                      ×××

1.बेदम पड़ी थी रोशनी

    ।।ग़ज़ल।।बेदम पड़ी थी रौशनी।।
                             राम केश मिश्र

चाँदनी रात में सनम पड़ी थी रोशनी ।।
वक्त बेवक्त मौसम पड़ी थी रोशनी ।।

पहुचते पहुँचते तीरे नजर में खो गयी ।
था पहला अंदाज, कम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद तारे चल रहे थे बेवफा के साथ ।
थी चमक मद्दिम, हरदम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद चमका ,हुस्न चमका, जुल्फ़े चमक गयी ।
कश्मकश दिल में हुयी जम पड़ी थी रोशनी ।।

उस नज़र की इक किरन आ मेरे दिल में चुभी ।
थी ज़िगर में उलझनें तो थम पड़ी थी रोशनी ।।

थी मन्द मुस्कान पर वह जिगर में आ चुभी ।
दिल गया हालात से ,गरम पड़ी थी रोशनी ।।

इक कदम उनका बहकना इक क़दम मेरा ।
दो फ़ासले बीच तक संगम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद सूरज का सबेरा शमा भी सरमा गयी ।
फ़ासले जब मिट गये पुरनम पड़ी थी रोशनी ।।

वही चाँद, वही चाँदनी वही शबनम वो फ़िजा ।
थी वही मंजर वहा पर नम पड़ी थी रौशनी ।।

"रकमिश"तेरी याद में रात भर जागा किया ।
उस नज़र के बाद तो बेदम पड़ी थी रोशनी ।।

                      ×××

।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।

            ।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।
                            R.K.MISHRA

तेरा खामोश होना तो मुहब्बत का कोई सुबूत नही ।।
यहा गुनाह करके भी लोग बड़े खामोश रहते है ।।

हुनर वे जानते होंगे मेरा खामोशिया पढ़ने का ।।
उन्हें शक है इसी से अब चेहरा वो छिपाते है ..

जरा तुम फांदकर देखो मुहब्बत में दीवालों को ।।
ख़ामोशी के न जाने फिर कितने मोड़ आयेगे ।।

बहुत से मोड़ आते है दरिया से किनारों तक ।।
तन्हा गम ख़ामोशी तो महज है राह मंजिल के .

किसी से प्यार के दरम्यां कभी खामोश मत रहना ..
तेरा ख़ामोश रहना ही उसे सितमगर बना देगा ..

तेरी नजदीकियों से तो ग़मो के फ़ासले अच्छे .
वहा खामोश होंगे तुम मुझे परवाह न होगी .

तेरा खामोश रहना भी तेरी रौनक बढ़ा देता .
मग़र आसान इससे दिल की राह न होगी ....

किसी दिन देख लेना तुम हमारे दिल के दर्पण में .
तुम्हारा रूप ही तुमसे हाले दिल सुना देगा ..

                                  ×××

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरा किरदार पढ़ लोगे।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरा क़िरदार पढ़ लोगे।। 
                            R.K.MISHRA

मेरी खामोशियो में भी मेरा इज़हार पढ़ लोगे .
कभी दिल से जरा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे .

न साहिल है न मंजिल की मुझे परवाह रहती है .
मग़र है आँख का दरिया छलकता प्यार पढ़ लोगे .

जरा तुम रोककर कर देखो हमारे आँख के आंशू .
झलकती झील में अपना अलग संसार पढ़ लोगे..

अभी तक बात करते हो हमेसा ही इशारों से . 
जरा आग़ोश में आओ दिली झंकार पढ़ लोगे . 

महज़ ये फ़ासले ही है जो हमको दूर करते है ..
यकीनन पास आये तो मेरा इनकार पढ़ लोगे ..

अग़र है शौक तुमको तो जाते हो चले जाओ .
ज़रा फिसले मुहब्बत में ग़मो की मार पढ़ लोगे ..

नही होते है पैमाने किसी से प्यार करने के ..
खुली दिल की किताबो में लिखा एतबार पढ़ लोगे..

                        ×××

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।

  ।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।
                             R.K.MISHRA

बरसकर सूख जाते है पसीनों की न चलती है  .
तपिश इस धूप की देखो सेवारो में मचलती है .

हमारे खेत में आकर जली फ़सलो को देखो तुम ,
यहाँ की मिट्टियाँ है तप्त गर्म शोले उगलती है  .

न टहनी हैं ,न पल्लव हैं ,न आशा फूल की इनमे ,
पत्तिया सूखकर लावा बनती है लटकती है .

खड़ा मेड़ो पर रहता हूँ खुरपी हाथ में लेकर ,
न घासें है न घासों में कोई रौनक़ उभरती है .

लगाकर पम्प से पानी भरता रोज इनको हूँ  ,
करूँ मैं लाख़ कोसिस पर धरा दिन रत जलती है .

निगाहें उठ ही जाती हैं जहाँ धुएं उमड़ते है ,
चिमनिओ के,नही बदल की छाया भर उमड़ती है .

अगर हो आँख में पानी तो भर दूँ आज इनको मैं ,
मग़र सूखी इन नदियो में निराशा ही झलकती है .

करू जी जान से मेहनत यही मिलता किसानी में,
करूँ किससे शिकायत मैं गर्म आहे निकलती है  .

                        ×××

।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।

  ।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।
                             R.K.MISHRA

बरसकर सूख जाते है पसीनों की न चलती है  .
तपिश इस धूप की देखो सेवारो में मचलती है .

हमारे खेत में आकर जली फ़सलो को देखो तुम ,
यहाँ की मिट्टियाँ है तप्त गर्म शोले उगलती है  .

न टहनी हैं ,न पल्लव हैं ,न आशा फूल की इनमे ,
पत्तिया सूखकर लावा बनती है लटकती है .

खड़ा मेड़ो पर रहता हूँ खुरपी हाथ में लेकर ,
न घासें है न घासों में कोई रौनक़ उभरती है .

लगाकर पम्प से पानी भरता रोज इनको हूँ  ,
करूँ मैं लाख़ कोसिस पर धरा दिन रत जलती है .

निगाहें उठ ही जाती हैं जहाँ धुएं उमड़ते है ,
चिमनिओ के,नही बदल की छाया भर उमड़ती है .

अगर हो आँख में पानी तो भर दूँ आज इनको मैं ,
मग़र सूखी इन नदियो में निराशा ही झलकती है .

करू जी जान से मेहनत यही मिलता किसानी में,
करूँ किससे शिकायत मैं गर्म आहे निकलती है  .

                        ×××

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।नबाब तेरे दिल का।।

                               R.K.MISHRA

कितनी भी तारीफ़ करू मैं,ज़नाब तेरे दिल का .
अब तक न मिल सका कुछ हिसाब तेरे दिल का .

तू भी तो बेचैन है मेरी काशिश के शाये में ,
और मैं भी तो हो गया हूँ बेताब तेरे दिल का . 

अब ये वक्त की बंदिशें मुझे तकलीफ़ देती है .
न जाने कब से देखा है बस ख़्वाब तेरे दिल का .

तुम्हारे हुस्न की रंगत में डूबकर आया हूँ मैं,
भला कब तक महकेगा वो गुलाब तेरे दिल का .

अब बेसब्र हो गया हूँ बस तू तार तार कर दे ,
मैं बनकर दिखा दूंगा आफ़ताब तेरे दिल का .

गुनाह तू समझे तो हर सज़ा मंज़ूर मुझको हैं ,
बाक़ी होगा वो दर्द भी लाज़बाब तेरे दिल का . 

ये नशा तेरी दीवानगी का सहा नही जाता है ,
अब इल्म कर ले मैं ही हूँ नबाब तेरे दिल का .

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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं ।।

  ।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं।।

                        R.K.MISHRA
                       

राहे मुहब्बत का मरीज़ तो था ही मैं .
साथ तेरा मिला ख़ुशनसीब तो था ही मैं.

एक लम्हा प्यार का भी मुझे न दे सके ,
फर्क न पड़ता तुम्हे हबीब तो था ही मैं .

सकून मिल जाता तुम्हे भी अश्क़ की बरसात से ,
इश्क़ में गम की दवा तबीज तो था ही मैं .

हर सज़ा मंजूर थी और क्या लुटता मेरा. 
दिल भी अपना न हुआ गरीब तो था ही मैं .

बाहों में लिपटकर रो लेने दिये होते मुझे ,
फ़ासले कम ही थे और क़रीब तो था ही मैं .

पर दिखा कर इश्क़ की झूठी मुझे नुमाइसे ,
कत्ल किये जज़्बात का नाचीज़ तो था ही मैं .

हर ग़ज़ल,हर नज़्म तेरी आह का शैलाब है ।
वज़्न तेरे गम का है अजीज तो था ही मैं .

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सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

किसी को ग़म दिया बेसक किसी की आँख भर आयी ।।
तेरे उन शुर्ख होठो की सज़ा किसने नही पायी ।।

तेरी नज़रो की छाया में सकूने इश्क़ फ़रमाते ।।
तेरी रश्मे मुहब्बत में कसम किसने नही खायी ।।

पलक झपके अदा तेरी कि पहले ही बदलती थी ।।
न समझे लोग नाज़ुक दिल मिली सबको ही तन्हाई ।।

गयी तू लूट महफ़िल को ज़रा सी रौशनी देकर ।।
बड़ी तकलीफ़ देती है तेरी बेबाक़ तन्हाई ।।

मेरा वो शक सही निकला दिलो के खेल होते है ।।
यहा सजती मुहब्बत में गमो के नाम सहनाई ।।

उन्हें आगाह कर दू मैं जिन्हें है नाज़ जिश्मो पर ।।
किये उनके गुनाहो की करूँ कब तक मैं भरपाई ।।

मग़र ये याद रख हमदम सज़ा तुमको भी है वाज़िब ।।
तेरा मज़ाक कर देगी वो तेरे दिल की मंहगाई ।।

                            R.K.MISHRA

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

हमारे आँख के आंशुओं की कीमत नही होती ।।
अब ग़म और तन्हा से दिक्कत नही होती ।।

प्यार के सारे हुँनर मैं सीख़कर रोया किया ।।
इस इश्क़ में चाहतो की इज्जत नही होती ।।

प्यार को इक शौक़ सा सब पाल लेने है लगे ।।
अब अज़नबी दर अज़नबी हुज्जत नही होती ।।

प्यार में जब दूरियाँ बढ़ गयी तो खो गये ।।
अब इंतजरो के लिये फुर्सत नही होती ।।

सब्र करता कब तलक मैं साहिलों पर खो गया ।।
दर्द सुनते लोग सब पर मोहलत नही होती ।।

इश्क़ के इस दरमियां मैं हकीमो से मिला ।।
कह दिये तहक़ीक़ कर कि मन्नत नही होती ।।

या इलाही दर्द तेरा बन गया नासूर अब ।।
अब मेरे इन मरहमो से राहत नही होती ।।

हो सके आ देख लेना साहिलों पर दर्द मेरा ।।
अब इश्क़ करने की मेरी जुर्रत नही होती ।।  

                       R.K.MISHRA

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...