।।ग़ज़ल।।बेदम पड़ी थी रौशनी।।
राम केश मिश्र
चाँदनी रात में सनम पड़ी थी रोशनी ।।
वक्त बेवक्त मौसम पड़ी थी रोशनी ।।
पहुचते पहुँचते तीरे नजर में खो गयी ।
था पहला अंदाज, कम पड़ी थी रोशनी ।।
चाँद तारे चल रहे थे बेवफा के साथ ।
थी चमक मद्दिम, हरदम पड़ी थी रोशनी ।।
चाँद चमका ,हुस्न चमका, जुल्फ़े चमक गयी ।
कश्मकश दिल में हुयी जम पड़ी थी रोशनी ।।
उस नज़र की इक किरन आ मेरे दिल में चुभी ।
थी ज़िगर में उलझनें तो थम पड़ी थी रोशनी ।।
थी मन्द मुस्कान पर वह जिगर में आ चुभी ।
दिल गया हालात से ,गरम पड़ी थी रोशनी ।।
इक कदम उनका बहकना इक क़दम मेरा ।
दो फ़ासले बीच तक संगम पड़ी थी रोशनी ।।
चाँद सूरज का सबेरा शमा भी सरमा गयी ।
फ़ासले जब मिट गये पुरनम पड़ी थी रोशनी ।।
वही चाँद, वही चाँदनी वही शबनम वो फ़िजा ।
थी वही मंजर वहा पर नम पड़ी थी रौशनी ।।
"रकमिश"तेरी याद में रात भर जागा किया ।
उस नज़र के बाद तो बेदम पड़ी थी रोशनी ।।
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