गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।हर मज़ा बेकार सा था।

    ।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स  गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

                           R.K.MISHRA

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