रविवार, 29 जनवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत जब नज़र आती ।

      ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही की जरूरत क्या जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गुरुद्वारा न गिरजाघर ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

सोमवार, 23 जनवरी 2017

ग़ज़ल।ख्वाहिशे तमाम न थी ।

      ग़ज़ल ।। ख्वाहिशें तमाम न थी ।। 

जिंदगी थी रेत सी बन्दिसे तमाम न थी ।
प्यार के आग़ोश में ख्वाहिशे तमाम न थी ।।

कट गये वो दर्द के लम्हे ज़रा सा घाव दे ।
चुप रहा हर जख़्म पर नुमाइशे तमाम न थी ।।

रह गया ख़ामोश मैं वो दग़ा करते रहे ।
प्यार में कायल मेरी फ़रमाइशें तमाम न थी ।।

था बड़ा नादान दिल उनको समझ बैठा ख़ुदा ।
था यकीं मेरे प्यार में आजमाइसे तमाम न थी ।।

रकमिश तुम्हारी याद के आंसू बड़े अनमोल है ।
पर क्या करे दिल गमसुदा रहाईशे तमाम न थी ।।

                                    राम केश मिश्र

सोमवार, 9 जनवरी 2017

ग़ज़ल ।विंदास है कुहरा ।

            ग़ज़ल।विंदास है कुहरा।

आलम ठंडी का आसपास है कुहरा ।
अपनी इस जवानी में विंदास है कुहरा ।।

कुछ समय के लिये आ जाती निशाँ उतरकर ।
कभी हम पसन्द तो कभी विनास है कुहरा ।।

अलावे जलाकर बैठे लड़के जवान लोग ।
बूढ़े भी कहते अब अनायास  है कुहरा ।।

इक किरण आकर रौशन करती ज़मी को ।
देख सूरज की तपिश ख़लास है कुहरा ।।

गर्मी जब बढ़ी कुहरे की परेसान है सूरज ।
देख लोगो की परेसानी उदास है कुहरा ।।

भला सूरज के सामने कहा तक लड़ता वह ।
हुआ बेबस, लाचार, हतास है कुहरा ।।

रात से है दुश्मनी सुबह तक आता नही ।
समय बदला हो गया निरास है कुहरा ।। 

                            © राम केश मिश्र

ग़ज़ल।मैं भी सितारा था।

             ग़ज़ल।मैं भी सितारा।

मैं भी था सितारों में जगमगाने वालों ।।
थम जाने दो आंशू गीत गाने वालो ।।

अपने लब्ज़ो की बात तो बया कर दू ।
सुना देना तुम भी किस्सा सुनाने वालों ।।

मुश्किलें बहुत हैं अब तो समझ जाओ ।
कब समझोगे मुझको गम में रुलाने वालों ।।

जिन्दा रहा तो जिंदगी बेमौत मार डाली ।
सुन मेरे ज़नाज़े पर यूँ मुस्कराने वालों ।।

मेरी ह्मवफ़ा पर यक़ीन नही है तुमको ।
अपनी बेवफ़ाई पर भी मुस्कराने वालों ।।

अपनी आज़ादी की खुशियां मना लेना तुम ।
आग मद्दिम ही लगाना जिन्दा जलाने वालों ।।

कुछ संगदिल भी देखेगे उस धुँये का जलवा ।
आ गये थे कब्र पर खुसबू चढ़ाने वालों ।।

कब तलक लड़ता मैं वक्त की उस मार से ।
दुश्मनों से मिल गये मुझको जिलाने वालों ।।

जनाजा तो निकल गया इंतक़ामे प्यार में ।
तुम्हारे सिर्फ आँसू ,ऐ आंशू बहाने वालों ।।

बुझेगा नही धुँआ ये आकाश तक जायेगा ।
सितारों में रहूंगा मैं ऐ मुझको मिटाने वालों ।

कही न झुके सर मुहब्बत के शिवा रकमिश ।
देता हूं दुआ कब्र पर सर को झुकाने वालों ।। 

                               राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...