शनिवार, 23 जुलाई 2016

ग़ज़ल।आइना आँख तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

ग़ज़ल ।आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

इरादे इश्क़ में बेसक दिले बंजर बना देगा ।
आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।।

बहेगा एक दिन तेरे जुदाई में गम-ए-आँसू ।
चुभेगा रात दिन जख़्मी कोई खंजर बना देगा ।।

लक़ीरें हाथ मत देख़ो भरोसा रख खुदाई पर ।
रहा ये प्यार जो सच्चा गमे मंज़र बना देगा ।।

करोगे लाख़ अब कोशिस न आऊँगा दुबारा मैं ।
नकामे इश्क़ इस दिल को कोई लंगर बना देगा ।।

बचूंगा खाक़ मैं मसलन तेरी तन्हाइयां अच्छी ।
जबाना तो तेरी नजरों को ही नश्तर बना देगा ।।

दुआओं से सुना है कि किस्मत भी बदलती है ।
साहिल तू बना रकमिश'समन्दर वो बना देगा ।।  

                           ©© राम केश मिश्र 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।।

वफ़ा के नाम पर बिल्कुल नफ़ासत अब नही होती ।
कोई दिल तोड़ जाये तो शिकायत अब नही होती ।।

मुझे मालुम है पत्थर दिल बनेगा एक दिन पानी ।
मग़र है दर्द का चस्का कि राहत अब नही होती ।।

मिलेगा एक दिन धोख़ा सभी मासूम चेहरों से  ।
छिपी नफ़रत गुमानी है कि चाहत अब नही होती ।।

निगाहों की गुज़ारिश में यहाँ बेदाग़ हर कोई । 
लगाकर तोड़ देते दिल शरारत अब नही होती ।।

सुबह से शाम तक मैंने बहाया था कभी आँसू ।
किसी की चाह में बेसक हिमाक़त अब नही होती ।।

यहाँ आँखों ही आँखों में बसी है रंजिसें हरपल ।
बिक़े या टूट जाये दिल नसीहत अब नही होती ।।

हुआ था ज़ख्म जो रकमिश' वही नासूर बन उभरा ।
करूँ मैं लाख़ क़ोशिश पर मुहब्बत अब नही होती ।

                              © राम केश मिश्र

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत मुझे जिंदगी से नही।

     ग़ज़ल।शिकायत मुझे जिंदगी से नही ।

मैं मिला हूँ मग़र आदमी से नही ।
शिक़ायत मुझे जिंदगी से  नही ।।

जीत लो सारी दुनिया मुझे गम नही ।
मग़र प्यार से दुश्मनी से नही ।।

एक अर्शे से तलाश जिनकी रही ।
पास आये मग़र तश्नगी से नही ।

तोड़  देते यहाँ लोग दिल साथियो ।
ज़ख्म मिलता मुझे अज़नबी से नही  ।।

दिल के बदले यहाँ सिर्फ दिल चाहिए ।
प्यार मिलता कभी बन्दगी से नही । 

तरसते मिले लोग बेजार है ।
दर्द सहते मगर ताजगी से नही ।।

बात उनसे  हुई तो मचलने लगे ।
पेश आये मग़र सादगी से नही ।। 

अँधेरा ही'रकमिश'सरेआम है ।
नफ़ासत मुझे रोशनी से नही ।।

                   राम केश मिश्र'रकमिश

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

दूरियों का जख़्म अब भरता नही ।
क्यों ज़मीं को आसमां मिलता नही ।।

ढल रही है उम्र बेसक बेखबर ।
चाह का सूरज कभी ढलता नही ।। 

प्यार है ये प्यार की दुश्वारियां ।
प्यार में ईमान तो मरता नही ।।

हो रहा रुसवा तुम्हारे प्यार में ।
ख़्वाब अक़्सर रात में बुनता नही ।। 

प्यार का मरहम खरीदा तुम करो ।
रंजिसों से घाव तो भरता नही ।।

बन रही है आँसुओं की झील इक ।
अश्क़ आँखों में कभी जलता नही ।।

गर्दिसों से दूर साहिल के लिए ।
आदमी खुदगर्ज़ है चलता नही ।। 

एक पौधा तू लगा विश्वास का ।।
बेखुदी में प्यार तो पलता नही ।।

वक्त की है बंदिसे 'रकमिश' मग़र ।
प्यार का उठता धुँआ बुझता नही ।। 

                   राम केश मिश्र'रकमिश'सुल्तानपुरी ।

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...