बुधवार, 6 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।।

वफ़ा के नाम पर बिल्कुल नफ़ासत अब नही होती ।
कोई दिल तोड़ जाये तो शिकायत अब नही होती ।।

मुझे मालुम है पत्थर दिल बनेगा एक दिन पानी ।
मग़र है दर्द का चस्का कि राहत अब नही होती ।।

मिलेगा एक दिन धोख़ा सभी मासूम चेहरों से  ।
छिपी नफ़रत गुमानी है कि चाहत अब नही होती ।।

निगाहों की गुज़ारिश में यहाँ बेदाग़ हर कोई । 
लगाकर तोड़ देते दिल शरारत अब नही होती ।।

सुबह से शाम तक मैंने बहाया था कभी आँसू ।
किसी की चाह में बेसक हिमाक़त अब नही होती ।।

यहाँ आँखों ही आँखों में बसी है रंजिसें हरपल ।
बिक़े या टूट जाये दिल नसीहत अब नही होती ।।

हुआ था ज़ख्म जो रकमिश' वही नासूर बन उभरा ।
करूँ मैं लाख़ क़ोशिश पर मुहब्बत अब नही होती ।

                              © राम केश मिश्र

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