गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हमआम का डर है।


     ग़ज़ल।यहा हमआम का डर है।

तुम्हारे दर्द तन्हा ग़म ख़फ़ा बदनाम का डर है ।।
मिलेगा प्यार के बदले जफ़ा अंजाम का डर है ।

अभी मासूम हो काफ़ी हिदायत पर नही दूँगा ।
मसलन फ़र्ज़ समझो या कोई पैगाम का डर है ।।

चली जा सोचकर आना न आना तो ही अच्छा है ।
मुहब्बत करके देखा मैं हुआ नाक़ाम का डर है ।

भरोसा क्या करूँ तुम पर भरोसा तोड़ ही दोगे ।
यक़ीनन तुम लगा दोगे दिले इल्जाम का डर है ।।

नजर ही गाड़ देगे सब जरा कर दी सरारत तो ।
मुहब्ब्त है तो होगी ही सुबह से शाम का डर है ।।

करू मैं लाख़ कोशिस तब दुनिया ये न मानेगी ।
जहर सा पी न पाउँगा सजे उस जाम का डर है।।

साहिल पर न आ "रकमिश" यहा रिश्ते बिखरते है । 
वहा गैरो से डर तुमको यहा हमआम का डर है ।।

                       @रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।मनाने कौन आता है।

ग़ज़ल।मनाने कौन आताहै ।।

अग़र रूठो मुहब्बत में मनाने कौन आता है ।।
किया वादा इबादत का निभाने कौन आता है ।।

लिए इक ख़्वाब आते कि मिलेगी मंजिले सबको ।।
यहा साहिल पे दुनिया खुद लुटाने कौन आता है ।। 

जरा सी भूल के बदले यक़ीनन तोड़ देगे दिल ।
सहेगे दर्द पर  तन्हा बिताने कौन आता है ।।

करोगे लाख़ कोशिस पर यहा दिल टूट जायेगा ।
मिलेगे जख़्म पर मरहम लगाने कौन आता है ।। 

यहा के मुंशिफी मुखविर मुअक्किल हमसफ़र सारे।। 
लगे है दर्द सब पाने  दिवाने कौन आता है ।। 

भरोसा छोड़ दे 'रकमिश' मिलेगी बेवफाई ही ।।
वफ़ा का कर्ज दुनिया में चुकाने कौन आता है ।।

               ---@रकमिश

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

   ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

इलाही छोड़ के नफ़रत दिलों से दिल नही मिलता ।
भरी इस भीड़ के दरम्यां कोई हमदिल नही मिलता ।

जहा देखा मिली हमको निगाहें दर्द में बेबस ।
भटकते दर व् दर बेघर उन्हें महफ़िल नही मिलता ।

गमे हालात बरपी है मुक़द्दर बेवफा निकला ।
उम्रभर प्यार करते पर कोई हासिल नही मिलता ।

इरादे इश्क़ में मशलन बने है वक्त के चश्के ।
वादे टूटते हर पल ग़मे बोझिल नही मिलता ।

यक़ीनन प्यार की मजलिश में डूबे लोग क़ायल है ।
भरे है लोग बेशक़ पर कोई क़ाबिल नही मिलता ।

सहोगे कब तलक 'रकमिश' उनके प्यार के सदमे ।
तुम्हें मंजिल नही मिलती उन्हेँ साहिल नही मिलता ।। 

                                @रकमिश

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हुआ बदनाम 'रकमिश' है।

    ग़ज़ल।हुआ बदनाम रकमिश है ।

अदाओं की कशिश महफ़िल गवाहों की नवाज़िश है ।
तुम्हारे प्यार का मौका कोई गुमनाम साज़िश है ।।

मुझे मन्ज़ूर है फिर भी निभाकर रश्म जाऊँगा ।
लुटा दी जिंदगी हमने तुम्हारी एक कोशिस है ।।

यहा हमदम,यहा रहबर,यहाँ संगदिल दिवाने सब ।
लगे दिल को लगाने सब हुये बेदाम बंदिश है ।।

हुआ है हाल दिल का क्या अगर पूंछो तो मत पूछो ।
तुम्हारे इश्क़ से नफ़रत ख़ुदी के दिल से रंजिश है ।।

तुम्हारे दर पे आया हूँ मलाल-ऐ-इश्क से बोझिल ।
बताने भर कि दुनिया में हज़ारों दर पे नरगिस हैं ।।

गुरूं मतकर, ज़फ़ा मतकर, इबादत हुश्न की कर ले ।
तवज्जो सीख़ साहिल पर हुआ बदनाम "रकमिश" है ।।

                        @राम केश मिश्र

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यहा इज्ज़त नही मिलती।

   ग़ज़ल।यहा इज्जत नही मिलती।

मुहब्बत में गुनाहों से जिन्हें मोहलत नही मिलती ।
खुदाई है खुदा की पर कभी रहमत नही मिलती ।

छिपी मासूम चेहरों पर गुनाहों की कहानी है ।
अदाओं की नुमाइस से इन्हें फ़ुरसत नही मिलती ।

यक़ीनन ढह ही जायेगी हमारे ख़वाब की मंजिल ।
मुझे मालूम है फिर भी तनिक राहत नही मिलती ।

सहेगे और भी सदमे तुम्हारी चाह में बेबस ।
चला मैं दूर जाऊँगा यहा नफ़रत नही मिलती ।

पलटकर देखने की तुम करोगे लाख़ कोशिस पर ।
हुई बेज़ार नजरो से कभी जन्नत नही मिलती ।

बहुत नाज़ुक तज़ुर्बे है तुम्हारे प्यार के 'रकमिश' ।
शहर से जा रहा तेरे यहा इज्ज़त नही मिलती ।

                       @राम केश मिश्र

रविवार, 6 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला।

   ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला ।

तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।।।

पुराने हो गये मसले मग़र हर जख़्म ताज़ा है ।
ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा पाने नही निकला ।।

बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की कोई महफ़िल ।
दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा गाने नही निकला ।। 

नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज तक दिल में ।
तड़पता ऱोज दिल है पर ख़ुदा पाने नही निकला ।।

मुज़रिम हूँ  दिवाना हूँ बेगाना हूँ आवारा हूँ ।।
मारा हूँ मुक़द्दर का सजा पाने नही निकला ।। 

चला आया हूँ 'रकमिश' मैं लुटाकर प्यार की दौलत ।
मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने नही निकला ।। 

                        @राम केश मिश्र

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

शेर।किस्से दर्द के अक्सर।

    ।।शेर।। किस्से दर्द के अक्सर।

करूँ किससे शिकायत मैं तुम्हारे प्यार की संगदिल ।
साहिल से समन्दर तक तुम्हारी ही तो चर्चा है ।।

डूबकर देखा हूँ एहसासों की तपिस के शाये में ।
खुद की चाहतो की कही भी मंजिल नही पाया ।

यहा के लोग है कातिल सजा ऐ मौत से पहले ।।
हजारो बार मरते है मुहब्बत में मुअक्किल अब ।।

मुहब्बत से जो बच निकले उन्हें नफरत ने मारा है ।
भरी महफ़िल में अब भी वो तन्हा है अकेले है ।।

वहा भी सब्र न मिलता यादों की रवानी से ।।
किस्से दर्द के अक्सर दिनोदिन याद रहते है ।।

                         @राम केश मिश्र

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यही दस्तूर होता है ।

     ग़ज़ल। यही दस्तूर होता है ।

जिसे चाहो मुहब्बत में वही मजबूर होता है ।
रहे तन्हा,उदासी ,गम बड़ा मशगूल होता है ।।

मिलेगीं एक पल खुशियां नजर भर अश्क़ आयेंगे ।
उम्रभर फासले मिटते मग़र वह दूर होता है ।।

बनेंगे रोज़ यादों के झरोंखे चाँद में चेहरा  ।
यही सच है मुहब्बत का यही दस्तूर होता है ।।

ख़ुशी के एक लम्हे जो हमे जीना सिखाएंगे ।
बनेगे जिंदगी के गम ज़रा भरपूर होता है ।।

ख्वाबो की जमी पर ही आहे ऱोज उभरेंगी ।
मिले जो ख़ुशनुमा साहिल असल में दूर होता है ।।

मंजिलें पास ही होंगी मिलेंगे रास्ते खुद से ।
जिंदगी कट भी जाये पर नही मंजूर होता है ।।

मिलेंगी दर्द की मजलिश बेशक गम के मंजर भी ।
यकीनन जख्म हो ताज़ा गमे नासूर होता है ।।

करो तुम कूँच साहिल से "रकमिश"बेवफा दुनिया ।
यहा नादान दिल वाले नशेमन चूर होता है ।।

                            @राम केश मिश्र

बुधवार, 25 नवंबर 2015

ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता ।

    ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता।

दर्द कितना भी कम हो मुस्कुराया नही जाता ।।
जख़्म मुहब्बत का हो तो भुलाया नही जाता ।।

माना कि हर कोई है प्यार के क़ाबिल यहा ।
पर हर किसी से दिल तो लगाया नही जाता ।।

रुसवा हो ही जाओगे किसी न किसी दिन तुम
बेख़ौफ़ अदाओं का मय पिलाया नही जाता ।।

टूट कर ये इल्म भी बिखर जायेगा इक दिन ।
इश्क़ में हर वादा तो निभाया नही जाता ।।

क्या करेगा वो तवज्जो अब तेरे एतबार की ।।
वज़्न ऐ हालात जिससे उठाया नही जाता ।।

साहिलों के पास अब भी हैं पड़ी वीरान राहें ।
हर अज़नबी को रास्ता दिखाया नही जाता ।।

भूलकर "रकमिश" न आना साहिलों के पास तुम ।
खुदी के लिए दिल किसी का दुखाया नही जाता ।।

                           @राम केश मिश्र 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल।आराम नही आया तो ।

     ग़ज़ल।आराम नही आया तो।

आज तेरा ख़त ,तेरा पैगाम नही आया तो ।
टूट ही गया दिल, मेरा नाम नही आया तो ।

ख्वाबो के शहर में अब धुएं उठने लगे हैं ।
मैं तुमसे मिलने इक शाम नही आया तो ।

फर्क तो पड़ ही गया चाहतो में दूरियों से ।
बढ़ गये दिल के भी दाम, नही आया तो ।

प्यार तो तेरा इक जूनून था, ख्वाहिस थी ।
दर्द मिला दिल को इनाम ,नही आया तो ।

साहिलों से मैं चला था खोजने मंजिल कोई ।
साहिलों पर रह गया गुमनाम ,नही आया तो ।

आ ही जाता मैं तेरे  काशिस, तेरे पहलू में । 
छलक ही गया हुश्न -ऐ -जाम नही आया तो ।

फ़िक्र न थी ,दर्द था तुझसे बिछड़ जाने का ।
पर तुम तो लगा बैठे इल्जाम नही आया तो ।

हो रहे थे दर्द में नासूर मेरे दोस्त "रकमिश" ।
फिर कर गये बदनाम आराम नही आया तो ।

                               ..... राम केश मिश्र

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग़ज़ल । ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।

   ग़ज़ल । ख़ुद रोशनी जलने लगी है ।
             (दीपावली विशेष)

अब रोशनी क्यों जुल्म की ये बन्दगी करने लगी है ।
आजकल क्यों चाल दुनियां दोगली चलने लगी है ।।

मन्नतो से कुछ नही होगा जलाना दीप तुमको ।
अंधकारों की निकम्मी बेरुखी बढ़ने लगी है ।।

मजलिसों में ,महफ़िलो में , साहिलों पर चल दिखा दें ।
है रुआँसे लोग सब आँख भी भरने लगी है ।।

हर तरफ़ है ख़ौफ़ के मंज़र पड़ा गुमनाम साहिल ।
दर्द की आहों पर छायी बेबसी पलने लगी है ।।

क्या मिलेगा मौत से जादा मुसाफ़िर सोच ले तू ।
उम्र का मत कर भरोसा जिंदगी छलने लगी है ।।

हौंसला रख पथ्थरों में भी ख़ुदा मिलता यहा पर ।
चल दिखा दे रास्ते अब अस्मिता मरने लगी है ।।

चल जला ले रौशनी अब हम मिशाले प्यार की ।
बढ़ रही है गम की रौनक़ शाम भी ढलने लगी है ।।

फ़िक्र मतकर तू चले तो कारवाँ भी चल पड़ेगा ।
चलके 'रकमिश' देख लो ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।।

                      .......राम केश मिश्र

शनिवार, 7 नवंबर 2015

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

।ग़ज़ल।आजमाते जा रहे सब।

  ।ग़ज़ल।आजमाते जा रहे सब।


जिंदगी में दोस्ती के गीत गाते जा रहे सब ।
पर दोस्तों की कदर ही अब भुलाते जा रहे सब ।।

बढ़ रही तादाद अपने दोस्तों की हर पहर ।
पर न जाने ठोकरों से जख़्म पाते जा रहे सब ।।

मर्ज की लेते दवा पर मर्ज अब बढ़ने लगा है ।
दर्द है ,तन्हाइयां पर मुस्कुराते जा रहे सब ।।

है यहाँ सब गम से बोझिल अपने ही हालात से ।
तर्ज मिलता ही नही पर गुनगुनाते जा रहे है ।।

न समझ पाये कभी जो प्यार की बारीकियों को ।
दिल के टुकड़े हो गये पर दिल लगाते जा रहे है ।।

इश्क़ और दोस्ती में शर्त तो होती नही है ।
न जाने फिर कौन सा वादा निभाते जा रहे सब ।।

साहिलों पर देखता हूँ रकमिश" तेरी दास्ताँ मैं ।
तोड़कर दिल कह रहे की आजमाते जा रहे सब ।।

                           .....R.K.MISHRA

रविवार, 1 नवंबर 2015

यहा खुद की नही चलती ।ग़ज़ल ।

   ग़ज़ल.यहा खुद की नही चलती ।

करोगे क्या शिकायत कर तुम्हारी है नही गलती ।।
ग़मो का नाम दुनिया है यहा खुद की नही चलती । 

जो तेरे दोस्त सारे थे जिन्हें तुम छोड़ आये हो ।
मिलें उनको मनाना तुम उमर फिर से नही मिलती ।

किसी की आँख का आँशू कभी बनकर न बहना तुम  ।
जरा सा प्यार देने से ख़ुशी तेरी नही मरती ।।

न जाने कौन सी फिसरत मची है आज़माने की ।
इल्म दिल पर नही होता आह उनकी नही भरती ।।

करो तुम फक्र सुन लेकिन बचे दो चार दिन ही है । 
वक्त फिर से न आयेगा  उम्र भी तो नही बढ़ती ।।

कही मुरझा न जाये दिल तुम्हारे खौफ़ से साथी ।
बहारें रोज न आती कली दिल की नही खिलती ।।

यकीनन तुम भी पाये हो धोख़ा प्यार में रकमिश"
मग़र दिलफेक दुनिया में ख़ुशी सबको नही मिलती ।। 

                          ---R.K.MISHRA

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

तेज़ाब उभर आता है ।ग़ज़ल ।

     तेजाब उभर आता है ।ग़ज़ल

मैं तो खामोश हूँ पर जबाब उभर आता है  ।। 
बीते लम्हों का इक ख्वाब उभर आता है  ।।

अब जा, चली जा तू मेरी नजर से दूर कही ।।
तुझे देखूं तो दर्द का शैलाब उभर आता है ।।

बात तो बिल्कुल मत कर तू अपनी बेगुनाही की ।।
गुनेहगार मैं भी नही बेताब उभर आता है ।।

अब दहकते है शोले खुद व् खुद तन्हाइयो में ।
तू मिले तो आँखों में आफ़ताब उभर आता है ।।

माना कि तेरी यादो में जन्नत की झलक मिलती है ।
ख़ुशनुमा चेहरा वो गुलाब उभर आता है ।।

जो भी मिला सुकून बनकर तोड़ ही गया दिल ।
अब हर कोई बेवफा ज़नाब उभत आता है ।। 

जा चली जा रकमिश" हर हाल भुला देगा तुझे ।।
पर भूलने की चाह से तेज़ाब उभर आता है ।

                           ---R.K.MISHRA

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

      ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

ये दुनियां संगदिल निकली मुहब्बत क्यों नही करती ।
फ़रेबी है अपनेपन की दौलत पर नही मरती ।।

चलो तुमको दिखाते है दवाओ की दुकानों में ।
तड़पते लोग रहते है दवा उनको नही मिलती ।।

बने मज़दूर बच्चों पर तरस अब हम नही खाते ।
करे दिन रात मेहनत पर आह उनकी नही थमती ।। 

जहा देखो वही पर अब रिश्वत की वसूली है ।
न जाने शख्शियत क्या है जेब उनकी नही भरती ।

न जाने कौन सी मिट्टी से बने है लोग दुनिया के ।
भलाई की परत बेशक़ अब उनपे नही चढ़ती ।।

यहाँ पर प्यार के भी तो अज़ब किस्से कहानी हैं ।
हवस बढ़ती ही जाती है कली दिल की नही खिलती ।।

उजाला नाम दे देकर अँधेरा खूब बढ़ाते है ।
दीवाली रोज आती पर दिलों के तम नही  हरती ।।

यहाँ के लोग रोते है खुदी के दर्द से ग़ाफ़िल ।।
ख़ुशी की देखकर रकमिश" ख़ुशी उनको नही मिलती ।। 

                      ---- R.K.MISHRA

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

शेर . हक़ीक़त

           ।।शेर।।हकीकत।

माना की वक्त की कोई भी कीमत नही होती है ..
पर  उम्र के तजुर्बे भी बड़े नायाब होते हैं..

अब रहने भी दो इन ख्वाबो को ख्वाब ही ।
बहुत ही फर्क होता है सपनो और हकीकत में ।।

जहा देखो जिधर देखो वही हालात है सबके ।।
कोई दिल को जलाता है कोई दिल ही जला देता ।। 

कभी मौका मिले गर तो चले साहिल पर तुम आना ।
तुम्हारे गम से ज्यादा भी यहा ग़मगीन रहते है ।। 

अब तो डर लगने लगा है उनके शाये से भी ऐ दोस्त ।
कि कही इल्ज़ाम ऐ मुहब्बत न लगा बैठे वे ।।

                    ---R.K.MISHRA

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा .

      ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा।

क़द्र उसकी क्यों करें हम जिंदगी से जो है हारा ।
चल रहे है ठोकरों पर आज हम भी बेसहारा ।।

हारने का ये तो मतलब हैं नही क़ि टूट जाओ ।
टूटने के दर्द का तुम कुछ करो एहसास प्यारा । 

मिल सकेगी न कभी मंजिल उसे तुम मान लेना ।
जो निकल दरिया से भागा बुझदिलो सा कर किनारा ।।

उम्र भर जिसने न समझा उम्र की तरकीबिया को ।
उम्र ढल जायेगी उसकी क्या करेगा बन बेचारा ।।

ख़्वाब सपने जो सजायें चल उसे कर दे हक़ीक़त ।
वक़्त गुजरा न मिलेगा कल न लौटेगा दुबारा ।।

सोचने की उम्र तो अब है नही मेरे दोस्त रकमिश" ।
कब उड़ोगे हौसलों के पंख का लेकर सहारा ।।

                       ---R.K.MISHRA

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का मतलब तो है.

    ग़ज़ल .प्यार का मतलब तो है .

ये जिंदगी तेरे इस निखार का मतलब तो है ।।
देर से ही सही पर इस प्यार का मतलब तो है ।। 

बहारें लाख़ आयीं हो चमन भी मुस्कुराया हो ,
मग़र तपती दुपहरी में बौछार का मतलब तो है ।।

ग़मो की फ़िक्र क्या करना ग़मो की जिंदगी सारी ।
किसी की याद में तन्हा इंतजार का मतलब तो है ।। 

जरूरी है नही होना सभी का बेवफा हमदम ।
भरें हों आँख में आँशू तो इंकार का मतलब तो है ।।

लगाकर जान की बाज़ी तुम्हारे दिल को जीते जो ।
तुम्हारी शौक़ के आगे गया हो हार का मतलब तो है ।।

करे हम रोज़ कोशिस पर मिले जब न खुदा हमको ।
करो उम्मीद मत छोड़ो एतबार का मतलब तो है ।।

बेशक़ अदाओं की नुमाइस दिल बहला रही हो पर ।
किसी के रूप की चितवन दीदार का मतलब तो है ।। 

कभी तुम करके देखो ख़ुद खुले दिल से इबादत को ।
मिलेगी रब की जन्नत भी संसार का मतलब तो है ।।
                  

                         ----R.K.MISHRA

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।न तुझमे कमी है।

        ।गज़ल।न तुझमे कमी है ।।
    

वहाँ तेरे आँगन में महफ़िल जमी है ।
यहाँ मेरे दिल पर गमे रौशनी है ।।

भले आज तेरी नजर न उठे ये ।
जो चेहरे से हटकर जमी पे ज़मी है ।।

मग़र आज मुझको पता चल गया है ।।
यक़ीनन छटेगा ये गम मौसमी है ।।

बहेगी हवा कोई चाहत की गर तो ।
ढहेगा तेरा गम ये जो रेशमी है ।।

अग़र हौसला हो जरा आज कह दे ।।
न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है ।।

जरा पास आकरके आँखों में झांको ।।
पलको पे उभरी नमी ही नमी है ।।

अग़र पास में हो छिपा लेना वो खत ।। दिखाना न उसका यहा लाज़मी है ।।

असर हो रहा है ये गम के है लम्हे ।
ग़र तस्वीर तेरी दिल में थमी है ।।

चलो अब तो लब्जे जुबाँ से तो बोलो ।
न मैं मोम हूँ न तू कोई ममी है ।।

                     ......R.K.MISHRA
                       ***

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।हर मज़ा बेकार सा था।

    ।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स  गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

                           R.K.MISHRA

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...