मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग़ज़ल । ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।

   ग़ज़ल । ख़ुद रोशनी जलने लगी है ।
             (दीपावली विशेष)

अब रोशनी क्यों जुल्म की ये बन्दगी करने लगी है ।
आजकल क्यों चाल दुनियां दोगली चलने लगी है ।।

मन्नतो से कुछ नही होगा जलाना दीप तुमको ।
अंधकारों की निकम्मी बेरुखी बढ़ने लगी है ।।

मजलिसों में ,महफ़िलो में , साहिलों पर चल दिखा दें ।
है रुआँसे लोग सब आँख भी भरने लगी है ।।

हर तरफ़ है ख़ौफ़ के मंज़र पड़ा गुमनाम साहिल ।
दर्द की आहों पर छायी बेबसी पलने लगी है ।।

क्या मिलेगा मौत से जादा मुसाफ़िर सोच ले तू ।
उम्र का मत कर भरोसा जिंदगी छलने लगी है ।।

हौंसला रख पथ्थरों में भी ख़ुदा मिलता यहा पर ।
चल दिखा दे रास्ते अब अस्मिता मरने लगी है ।।

चल जला ले रौशनी अब हम मिशाले प्यार की ।
बढ़ रही है गम की रौनक़ शाम भी ढलने लगी है ।।

फ़िक्र मतकर तू चले तो कारवाँ भी चल पड़ेगा ।
चलके 'रकमिश' देख लो ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।।

                      .......राम केश मिश्र

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