ग़ज़ल।भले नफ़रत मिले मुझको।
दुआ हर बार दूँगा मैं भले नफ़रत मिले मुझको ।
लगा कर दिल न तोडूंगा भले राहत मिले मुझको ।।
अग़र तू भाँप कमज़ोरी मुझे दिल का हवाला दे ।
कभी दिल की सुनूंगा न भले मोहलत मिले मुझको ।।
अभी तक याद है दिन वो तेरी बदसुलूकी का ।
कभी न भूल पाउगा भले इज्जत मिले मुझको ।।
मिला इस बार भी धोख़ा तो अब फिर से मनाना क्या ।
मुझे मंजूर है तन्हा भले मन्नत मिले मुझको ।।
शहर ये छोड़ जाऊँगा जरा बदनाम हूँ तो क्या ।
तेरे दर पे न आऊँगा भले हुज्जत मिले मुझको ।।
मेरी इक शर्त है "रकमिश" वफ़ा के नाम पर सुन ले ।
साहिल पर न आउगा भले जन्नत मिले मुझको ।।
©रकमिश सुल्तानपुरी