शनिवार, 30 जनवरी 2016

ग़ज़ल।भले नफ़रत मिले मुझको।

    ग़ज़ल।भले नफ़रत मिले मुझको।

दुआ हर बार दूँगा मैं भले नफ़रत मिले मुझको ।
लगा कर दिल न तोडूंगा भले राहत मिले मुझको ।।

अग़र तू भाँप कमज़ोरी मुझे दिल का हवाला दे ।
कभी दिल की सुनूंगा न भले मोहलत मिले मुझको ।। 

अभी तक याद है दिन वो तेरी बदसुलूकी का ।
कभी न भूल पाउगा भले इज्जत मिले मुझको ।। 

मिला इस बार भी धोख़ा तो अब फिर से मनाना क्या ।
मुझे मंजूर है तन्हा भले मन्नत मिले मुझको ।।

शहर ये छोड़ जाऊँगा जरा बदनाम हूँ तो क्या ।
तेरे दर पे न आऊँगा भले हुज्जत मिले मुझको ।। 

मेरी इक शर्त है "रकमिश" वफ़ा के नाम पर सुन ले ।
साहिल पर न आउगा भले जन्नत मिले मुझको ।।  

             ©रकमिश सुल्तानपुरी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...