गुरुवार, 28 जनवरी 2016

ग़ज़ल।कोई साज़िश नही होती।

   ग़ज़ल।कोई साज़िश नही होती।

वसूलों पर चले कोई मुझे रंजिश नही होती ।
तेरा दिल टूट जाये ये मेरी कोशिस नही होती ।

अग़र समझो कि प्यासा हूँ तुम्हारे हुश्न का साकी ।
तो सच है ,कि मुहब्बत में कोई बंदिश नही होती ।।

तरस कर इश्क़ में तेरे किसी दिन भूल जाऊँ मैं  ।
सहे फ़िर गम भरे लम्हें मेरी ख़्वाहिश नही होती ।।

यकीनन रूह तक मेरी है क़ायल रूप पर तेरे ।
तड़पकर एक हो जाते अग़र वर्जिश नही होती ।।

चलो मैं मान लेता हूँ ,तुम्हे डर है ज़माने का ।
मग़र है इश्क़ की रश्मे ,कोई साज़िश नही होती ।।

"रकमिश"तुम चले आओ ये साहिल तक विराना है ।
यहा है भीड़, तन्हाई ,कोई मजलिश नही होती ।।

                  ©रकमिश सुल्तानपुरी  

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