शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

ग़ज़ल।मिला इंसान का दर्ज़ा।

      ग़ज़ल।मिला इंसान का दर्जा।

गज़ब का रूप पाये हो मिला इंसान का दर्जा ।
करो दिल से इबादत तुम खुदा ,भगवान का दर्जा । 

ये मत सोचो कि क्या पाया, खोया क्या ज़बाने में ।।
जरा सोचों मिलेगा कब तुम्हे सम्मान का दर्जा ।।

यहा पर दोस्त दुशमन का किसी को फर्क न मालूम ।
वफ़ा कितना करो फिर भी मिले हैवान का दर्जा ।।

मिले जो अज़नबी तुमको उसे भी हमसफ़र समझो ।
अदब से पेश आकर दो उसे पहचान का दर्जा । 

ये रंगत ,मतलबी दुनिया, ये चाहत, दर्द ये खुशिया । 
मिलेगा न दुबारा फिर तुम्हे नादान का दर्जा ।। 

तभी कहता हूँ "रकमिश" मैं  चले साहिल पे तुम आओ ।
मिलेगा हर बखत तुमको यहां मेहमान का दर्जा ।। 

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...