ग़ज़ल।मिला इंसान का दर्जा।
गज़ब का रूप पाये हो मिला इंसान का दर्जा ।
करो दिल से इबादत तुम खुदा ,भगवान का दर्जा ।
ये मत सोचो कि क्या पाया, खोया क्या ज़बाने में ।।
जरा सोचों मिलेगा कब तुम्हे सम्मान का दर्जा ।।
यहा पर दोस्त दुशमन का किसी को फर्क न मालूम ।
वफ़ा कितना करो फिर भी मिले हैवान का दर्जा ।।
मिले जो अज़नबी तुमको उसे भी हमसफ़र समझो ।
अदब से पेश आकर दो उसे पहचान का दर्जा ।
ये रंगत ,मतलबी दुनिया, ये चाहत, दर्द ये खुशिया ।
मिलेगा न दुबारा फिर तुम्हे नादान का दर्जा ।।
तभी कहता हूँ "रकमिश" मैं चले साहिल पे तुम आओ ।
मिलेगा हर बखत तुमको यहां मेहमान का दर्जा ।।
©रकमिश सुल्तानपुरी
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