शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

ग़ज़ल।ज़माने से मिला धोख़ा।

    ग़ज़ल।ज़माने से मिला धोख़ा।

तुम्हारे साथ पल दो पल बिताने से मिला धोखा ।
जुनूने इश्क़ में दिल को लगाने से मिला धोख़ा ।।

लुटा दी हुश्न-ऐ-दौलत यकीं करके मुहब्बत पर ।
मग़र हर एक वादे को निभाने से मिला धोखा ।।

अग़र थी हुश्न की चाहत तो पहले ही बता देते ।
ख़िदमत-ऐ-पेश कर देते छिपाने से मिला धोख़ा ।। 

मुझे मालूम न था कि यहा हर शख़्स है प्यासा ।
लगा हमदम,लुटेरा ,हर दिवाने से मिला धोख़ा ।।

फ़रेबी लोग है फ़ैले ये साहिल से समन्दर तक ।
बने नासूर ज़ख्मो को दिखाने से मिला धोख़ा ।। 

तबाही हुस्न की होगी यक़ीनन प्यार कर देख़ो ।
कहा तक नाम लूँ "रकमिश"ज़माने से मिला धोख़ा ।।

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी 

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