गजल
दर्द दिल का बढ़ा आपने क्यों दिया ।
सिर्फ़ मुझको सज़ा आपने क्यों दिया ।।
आप भी हो गुनेगार मानो यकीं ।
मेरी चाहत भुला आपने क्यों दिया ।
आरजू थी तेरी दोसती की बहुत ।
दिल्लगी मे दग़ा आपने क्यों दिया ।।
राह भटका हुआ था मुसाफ़िर कोई ।
ग़म का मंज़र दिखा आपने क्यो दिया ।।
लफ़्ज के ज़ख़्म दिल मे समाते गये ।
आंसुओं को जला आपने क्यों दिया ।
मुद्दतो से मिली थी ख़ुसी की झलक ।
मुस्कराकर रूला आपने क्यों दिया ।।
फ़ाशलो के तऱीके थे रकमिश बहुत ।
मर्ज़ देकर दवा आपने क्यो दिया ।।
राम केश मिश्र
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