----------ग़ज़ल----------
साहिलों पर ढह गयी जब रहनुमाई प्यार की ।
हो गयी कमजोर ताक़त तब मेरे फ़नकार की ।।
रफ़्ता रफ़्ता काफ़िलों मे मै अकेला रह गया ।
खो गयी उम्मीद सारी आरजू दरकार की ।।
अलविदा कहने को आये पत्थरे दिल हमसफर ।
गलतियां मेरी गिनाते बढ़ गये असफ़ार की ।।
इक़तिजा मेरी न समझे जिंदगी जीने लगे ।
सुर्खियां बनने लगी थी बेवज़ह इनकार की ।।
ख़्वाहिखे उनकी अलग थी मेरी दुनियां से सदा ।
जुस्तुजू करता कहाँ तक फ़ाकिरी सरकार की ।।
बेख़ुदी में आजतक मैं ले सका न फ़ैसला ।
दिल हक़ीक़त जानता है दर्द ऐ अशआर की ।।
अनकही रकमिश हमारी जिंदगी की दास्तां ।
लोग चर्चा कर रहे थे पर तेरे किरदार की ।।
@राम केश मिश्र
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