रविवार, 23 जुलाई 2017

हो गयी कमजोर ताक़त तब मेरे फ़नकार की

            ----------ग़ज़ल----------

      साहिलों पर ढह गयी जब रहनुमाई  प्यार  की ।
      हो गयी कमजोर ताक़त तब मेरे फ़नकार की ।।

      रफ़्ता  रफ़्ता  काफ़िलों मे मै अकेला रह गया ।
      खो गयी  उम्मीद  सारी  आरजू  दरकार  की ।।

      अलविदा कहने को आये पत्थरे दिल हमसफर ।
      गलतियां मेरी गिनाते  बढ़  गये  असफ़ार  की ।।

      इक़तिजा मेरी न  समझे   जिंदगी   जीने  लगे ।
      सुर्खियां बनने  लगी थी  बेवज़ह  इनकार  की ।।

      ख़्वाहिखे उनकी अलग थी मेरी दुनियां से सदा ।
      जुस्तुजू करता कहाँ तक फ़ाकिरी सरकार की ।।

      बेख़ुदी में  आजतक मैं  ले  सका  न  फ़ैसला ।
      दिल हक़ीक़त जानता है दर्द ऐ अशआर  की ।।

      अनकही रकमिश हमारी जिंदगी  की  दास्तां ।
      लोग चर्चा कर  रहे  थे पर  तेरे  किरदार  की ।।

                             @राम केश मिश्र

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