@ ग़ज़ल।चाल दुनिया दोगली चलने लगी @
जिंदगी मे अड़चने बढ़ने लगी ।
चाल दुनियां दोगली चलने लगी ।
लाइलाजे प्यार मे सौदा हुआ ।
इत्तिका में आबरू लुटने लगी ।
हाथ लम्बे है बहुत कानून के ।
ज़ालिमों की गर्दने बढ़ने लगी ।।
है दबंगों के लिये ख़ुशियां सभी।
सादगी से ज़िंदगी डरने लगी ।
हुक्मरानों के लिये सारा जहां ।
जी हुजूरों को सज़ा मिलने लगी ।
जाहिलो को मुफ़्त ताजो तख्तियां ।
क़ाबिलों को धमकियां खलने लगी ।।
कर रहे हमआम 'रकमिश,गलतियां।।
जाबितों की किस्तियाँ फँसने लगी ।।
राम केश मिश्र
सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश
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