सोमवार, 10 जुलाई 2017

चाल दुनिया दोगली चलने लगी ।

@ ग़ज़ल।चाल दुनिया दोगली चलने लगी @

       जिंदगी मे अड़चने  बढ़ने  लगी ।
       चाल दुनियां दोगली चलने लगी ।

       लाइलाजे प्यार मे  सौदा  हुआ ।
       इत्तिका में  आबरू लुटने  लगी । 

       हाथ लम्बे है  बहुत  कानून  के ।
       ज़ालिमों की गर्दने  बढ़ने  लगी ।। 

       है दबंगों के लिये ख़ुशियां सभी।
       सादगी  से  ज़िंदगी  डरने  लगी । 

       हुक्मरानों के  लिये  सारा  जहां ।
       जी हुजूरों को सज़ा मिलने  लगी ।

       जाहिलो को मुफ़्त ताजो  तख्तियां ।
       क़ाबिलों को धमकियां खलने लगी ।।

       कर रहे हमआम 'रकमिश,गलतियां।।
       जाबितों की  किस्तियाँ फँसने लगी ।।

                           राम केश मिश्र
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

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