मंगलवार, 27 जून 2017

इश्क कोई ख़ैरात नही है ।

                              गीतिका
मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

हाल कैसे कहे अनकही दोस्ती ।

ग़ज़ल

          हाल कैसे कहे अनकही दोस्ती ।
          उम्रभर हाशिये पर रही दोस्ती ।।

          सब्र हमने जफ़ाएँ किया है बहुत ।
          दर्द उनको मिला तो ढही दोस्ती ।।

          वरना झूठे रहे मेरी यादों के पल ।
          मैं न बोलू तो समझो सही दोस्ती ।।

          फ़ायदों के लिये क़ायदा छोड़ दे ।
          है जफ़ा वो यक़ीनन नही दोस्ती ।।  

          इल्म हो हाल दिल का छुपा न रहे ।
          या ख़ुदा की क़सम है वही दोस्ती ।। 

     
                              राम केश मिश्र।

वक्त मिलता नही आदमी को कभी ।

ग़ज़ल
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
रुक्न-गालगा
गालगा गालगा गालगा गालगा ।
अरकान-फ़ायलुन  फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन

212         212     212   212 
ढूढ़ता  कौन  है  जिंदगी  को  कभी ।।
वक़्त मिलता नही आदमी को कभी ।। 

ज़ख़्म गैरो के नासूर करता रहा ।
चाह इसको नही सादगी को कभी ।।

शौक़ का दे हवाला किया पाप है ।
ढूढ़ पाता नही रोशनी को कभी ।।

चल पड़े है अँधेरा मे सुनसान है ।
प्यार देता नही अज़नबी को कभी ।।

लाख़ महफ़िल सजी दिल के सौदे हुए ।
वो न समझा यहाँ दिल्लगी को कभी ।।

रात लेती रही खुब मज़ा चाँद का ।।
रोशनी न मिली चाँदनी को कभी।।

                            राम केश मिश्र

शुक्रवार, 23 जून 2017

आपने आप से टूटता रह गया ।

            ग़ज़ल *आपने आपसे टूटता रह गया ।*

            आपने आप से टूटता रह गया ।।
            उम्रभर जिंदगी ढूढ़ता रह गया ।।

            आदमी जो मिला दोस्ती मे मुझे ।
            दर्द देकर मुझे लूटता रह गया ।।

            बेवफ़ाई से बोझिल कटे रास्ते ।
            मै रुका तो रुका रास्ता रह गया ।।

            जीत मुझको मिली न रहे फांसले ।
            जीतता जीतता हारता रह गया ।। 

            ज़िन्दगी मे सुनामी को मद्देनजर ।
            देखकर मौत से वास्ता रह गया ।। 

            बढ़ गया दोस्तों का हर कारवाँ ।
            मै वफ़ा बेवफ़ा देखता रह गया ।।

            आज हरसूं नज़र आ रही बेबसी ।
            वक़्त गुजरा मुझे रोकता रह गया ।। 

                               @ राम केश मिश्र

गुरुवार, 22 जून 2017

चाहत में किसी के खोने से ।

          *चाहत में किसी की खोने से ।*

चाहत मे किसी के खोने से ।
दिल सोच तु पहले रोने से ।।

एतबार न करना लोगों पर ।
बस प्यार ज़रा सा होने से ।।

हर शक़्स नही तेरे क़ाबिल ।
क़ातिल है रूप सलोने से ।।

बस हार मिलेगी सोच जरा ।
क़िरदार किसी का ढ़ोने से । 

फ़ुर्सत हि नही है लोंगो को ।
अब बीज ग़मो का बोने से ।

क़ीमत लग जायेंगी तेरी ।
दिल तौल रहे है सोने से ।। 

ये अश्क़ नही है मोती है ।
ढरते है आँख के कोने से ।। 

                                 राम केश मिश्र

रविवार, 18 जून 2017

दीवाने हो गये लेकिन ।

ग़ज़ल ।दीवाने हो गये लेकिन ।

तेरे  आग़ोश  के  शाये  पुराने  हो  गये लेकिन ।
उसी मदहोश हरक़त मे दिवाने हो गये लेकिन ।।

बहुत चाहा किसी के संग चलू मै ढूढ़ने मंजिल ।
वफ़ा तेरी मुहब्बत का चुकाने हो गये लेकिन ।।

चले आओ अभी यादों का हि बिस्तर सजाया हूं ।
मिलन अबतक अधूरा है ज़माने हो गये लेकिन ।।

सम्हाला था तेरे आने के पहले तक मेरे हमदम ।
रुके आंखों से अश्को को गिराने हो गये लेकिन ।।

तजुर्बा  है अलग तेरा  मुहब्बत  आजमाने  का ।
मिली फुर्सत मुझे ग़म से सयाने हो गये लेकिन ।।

यकीं मानो कि तन्हा हूं सँजोये याद हरपल की ।
ख़ुदा ही बेरहम निकला भुलाने हो गए लेकिन ।।

मिली न तू तेरे वादों  पे क़ायम तो रहा' रकमिश ।
तिरी चाहत मे लाखों दिल दुखाने हो गये लेकिन ।।

                                 राम केश मिश्र

ग़ज़ल।तगादे आ रहे घर तक ।

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           @ग़ज़ल ।तगादे आ रहे घर तक ।@

लिया क़र्ज़ा रक़ीबों से अमादे आ रहे घर तक ।
ग़रीबी  की  दशा देखो तगादे आ रहे घर तक ।। 

ख़बर उनको मिली शायद गया बाज़ार कुछ लेने ।
न पाया काम पर देरी  से सादे  आ रहे घर तक ।।

शहर की हर दुकानों पर मिरी तौहीनियाँ कहकर ।
किये  ग़ुस्से  को  बेक़ाबू  खरादे आ रहे घर तक ।।

पड़ी  फ़टकार सुनता मै  किये  बेबाक़  सर नीचे ।
मिरी इज्ज़त को पैरों तल हि रौंदे आ रहे घर तक ।। 

चिरागों तक नही जलते की उनके घर अंगीठी है ।
मिरे  जितने के कर्ज़े  के  बुरादे आ रहे घर  तक ।।

लगा बेशक़ हुजूमी से मिरे जज़्बात को धक्का ।
जुबां के ख़ंजरों से दिल कुरेदे आ रहे घर तक ।।

मुझे मनहूस सी लगती ख़ुदी की जिंदगी रकमिश ।
बुरे ख्यालों से  बोझिल से इरादे आ रहे घर  तक ।।

                              राम केश मिश्र

मेरे हिस्से मे पथ्थर तक नही आया ।

ग़ज़ल ।।

मुहब्बत मे मुहब्बत का हि मंज़र तक नही आया ।
थका मै ढूढ़ मंजिल को मेरा घर तक नही आया ।।

मिली सौगात दिल की है यहां सबको मुहब्बत मे ।
मेरे नाचीज़  हिस्से मे  पत्थर तक  नही आया ।।

रहा ताउम्र तन्हा ग़म  किसे मै  बेवफा  कहता  ।।
समझ मे प्यार का मतलब उम्रभर तक नही आया ।।

लकीरें हाथ मे कब तक बढ़ेगी  उम्र की यारो ।
मिली जो मौत हाथों मे ख़ंजर तक नही आया ।।

भरोशा था कभी शायद क़िस्मत का करिश्मा हो ।
उम्र ही ढल गयी सारी मुक़द्दर तक नही आया ।।  

पड़ा बरसों से सूना है घरौंदा प्यार का रकमिश ।
वफ़ा की बूं नही आयी सितमगर तक नही आया ।।
                             राम केश मिश्र

गुरुवार, 15 जून 2017

वतन के लिए ।

                       ग़ज़ल

ज़िन्दगी मेरी अर्पण वतन के लिए ।।
जान जाये तो अरि के दमन के लिए ।।

सांस चाहे भले हो मिरी आखिरी ।
मै जिऊंगा निख़ालिश चमन के लिए ।।

लाख़ गर्दिश वहां चाहे वीरान हो ।
पर तिरंगा रहेगा क़फ़न के लिए ।।

देश की शान तो है मिरी जिंदगी ।
मैं मिटाता रहूं हर जनम के लिए ।।

एक दुश्मन सलामत रहेगा नही ।
चीर सीने को दूंगा करम के लिए ।।

वक्त आएगा रकमिश कभी तो तिरा ।
पैर पीछे ना जायें परन के लिऐ ।।

                           राम केश मिश्र

बुधवार, 14 जून 2017

इश्क़ कोई ख़ैरात नही है ।

गीतिका

इश्क़ कोई ख़ैरात नही है ।
झूठी हर सौग़ात नही है ।।

मेरे तेरे प्यार मे यारा ।
पहले जैसी बात नही है ।।

मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।

     ग़ज़ल।इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।।

प्यार मे आयी ग़मो की आधियां ।
हो गयी वीरान दिल की बस्तियां ।। 

आँशुओ के ढेर पर सोना पड़ा ।
काम न आयी हमारी अर्जियां ।।

फ़लसफ़े हमने सुने थे प्यार के ।
इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।।

वक़्त का मारा हुआ है आदमी ।
कौन करता है वफ़ा मे गलतियां ।।

एकतरफा प्यार तो होता नही ।।
दोनों हाथों से बजी है तालियां ।। 

आजमाना तू मुझे अब छोड़ दे ।
बीत जाएगी जफ़ा मे सर्दियां ।।

सुन तिरा रकमिश यहां बीमार है ।
ख़ुद वहां पर कर रहे हो मस्तियां ।।

                      -राम केश मिश्र
             

मंगलवार, 13 जून 2017

गीतिका।मुझको अपना यार समझ ले ।

गीतिका

मुझको ख़ुद का प्यार समझ ले ।
बिन कांटो का हार समझ ले ।। 

टूट गया तो गया काम से ।
इकतारा का तार समझ ले ।

दिल को तेरे परख रहा हूं  ।
चाहे अत्याचार समझ ले ।। 

एहसासों का रूप बनाता ।
भावों का सृंगार समझ ले ।

सन्देहों की जाल बिछाकर ।
डूब रहा मझधार समझ ले ।

डरा हुआ हूं ख़ामोशी से ।
डर को मेरी हार समझ ले ।।

मुस्कानों की एक अदा पर ।
बेशक़ हूं बीमार समझ ले ।। 

रकमिश तेरा हुआ दिवाना ।
चाहे तो बेकार समझ ले ।।

                       
                   रकमिश सुल्तानपुरी


एक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब

ग़ज़ल।

दिल तुम्हारा मुझे भा गया  है ग़ज़ब ।
इक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब ।। 

भर खिली आँख मे तेरी तस्वीर है ।
तन शरारा सुकूँ पा गया है ग़ज़ब ।। 

ज़म गया ज़ाम साक़ी पिलाये किसे ।
ग़ल लुटाने को नापा गया है ग़ज़ब ।। 

रुक गयी रूप पर आज है चाँदनी ।
ग़म पुराना कुरेदा गया है  ग़ज़ब  ।। 

लत लगी है तुम्हे देखने की सनम ।
दिल दुआ से दवा पा गया है ग़ज़ब ।।

धड़कने बढ़ गयी है यहां रूह की ।
इत्तिका की हवा पा गया है ग़ज़ब ।।

गुम तुम्हारी अदाओं मे रकमिश हुआ ।
सिलसिला का मज़ा पा गया है ग़ज़ब ।। 

              रकमिश माने -राम केश मिश्र

सोमवार, 12 जून 2017

ग़ज़ल।मन्ज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।

     गजल।मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

दोस्तों ने सभी फ़ासला छोड़कर ।
दर्द बेशक़ दिया दायरा छोड़कर ।।

इश्क़ भी हाशिये पर रुका रह गया ।
जख़्म रोने लगा आसरा छोड़कर ।। 

शख़्स रोता रहा देखकर साज़िशें ।
वक़्ते दर प्यार का मामला छोड़कर ।। 

एक तूफ़ान दिल मे सुरु क्या हुआ ।
अश्क़ ठहरा रहा ज़लज़ला छोड़कर ।। 

चाहता चाहता चाहता चल पड़ा ।
चाहते मुड़ गयी चाहता छोड़कर ।।

पास आया बड़ी मिन्नतों से मग़र ।
मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

कौन सुनता भला दर्द रकमिश तेरा ।
मौत भी चल पड़ी दास्ताँ छोड़कर ।।

                            @ राम केश मिश्र

दोस्तों के लिये मैं रुका रह गया ।


       @ ग़ज़ल।दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।@

दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।
अश्क़ आंखों मे मेरे छुपा रह गया ।।

इश्क़ मे बेक़सी की हवा के लिए ।
एक अर्से से पाता सज़ा रह गया ।।

इश्क़ को जुस्तजू रास आयी नही ।
लाख़ चाहा मग़र फ़ासला रह गया ।।

लव्ज़ होठों पर आकर रुके से रहे ।
राज़ दिल का दिलों मे छुपा रह गया ।। 

सबको तौफा मिला दोस्ती का यहाँ ।
दोस्त ख़ामोश दिन देखता रह गया ।। 

साथ जत्था चला काफ़िलों का मिरे ।
पर अकेला यहाँ हर दफ़ा रह गया ।।

सिर्फ़ तन्हा मिला ज़िन्दगी मे मुझे ।
दर्द ही एक रकमिश, दवा रह गया ।। 

                                राम केश मिश्र

फ़ासला बढ़ता रहा ।

  -----------फ़ासला बढ़ता रहा ------------

दोस्तों का ज़िन्दगी भर दाख़िला बढ़ता रहा ।
दास्ताँ सुनकर वफ़ा की हौसला बढ़ता रहा ।। 

फ़ायदे की लाख़ कोशिश मे गवाँ दी जिंदगी ।
उम्रभर बस दर्द का सिलसिला बढ़ता रहा ।। 

हो गये सब ख़ाक अरमां छा गये बनके धुआँ ।
गर्दीशे तूफ़ान का इक ज़लज़ला बढ़ता रहा ।।

मुजरिमों के साथ मुज़रिम आईना बारूद का ।
हमवफ़ा की आरजू रख जो मिला बढ़ता रहा ।।

बावफ़ा की साख़ पर फिर आतिशों के ढ़ेर से ।
ज़ल गयी ज़ागीर दिल की मनचला बढ़ता रहा ।।

आफ़तों से बच नही पायी है दुनियां ये कभी ।
वक़्त दर तारीख़ दर फिर ग़िला बढ़ता रहा ।। 

मिट गये होते जहां के फ़लसफे रकमिश सभी ।
ज़िन्दगी से मौत का बस फ़ासला बढ़ता रहा ।।

                                    राम केश मिश्र

गुरुवार, 8 जून 2017

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।

            *एक ग़ज़ल की कोशिश*

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।
होता अमर है कैसे मरके दिखा दिया ।। 

यहाँ लोग जी रहे है इश्क़ की बदौलत ।
राँझा ने उम्रभर आहे भरके दिखा दिया ।।

लैला भी चाहती थी मजनूं को दर्द न हो ।
वो दर्द थी मुहब्बत हरके दिखा दिया ।।

राधा रही दिवानी शर्मोहया को छोड़ा ।
मीरा ने इस जहाँ मे तरके दिखा दिया । 

रोया था हर दिवाना तड़पी थी जिंदगी ।
ख़ूने ज़िगर से आंशू ढरके दिखा दिया ।।

ऐ शौक़ है ख़ुदा की हर चीज़ लाज़िमी है ।
है बेज़ुबान तूफ़ां छल के दिखा दिया ।।

ऐ 'रक,मिली जुदाई साहिलों के माफ़िक़ ।
थे रहनुमां वे इश्क़ पड़के दिखा दिया ।। 

                         @राम केश मिश्र

Ram Kesh Mishra

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मंगलवार, 6 जून 2017

यहाँ पर मुस्कुराने मे।

         ग़ज़ल -यहाँ पर मुस्कुराने मे

तलाशे इश्क़ मे निकला जफ़ा के आशियाने मे ।
बड़ी तकलीफ़ पाया हूं यहाँ पर मुस्कुराने मे ।।

मिली जो मतलबी दुनियां तराशेगी मुहब्बत को ।
मुझे मालूम है लेकिन मज़ा है आजमाने मे ।।

वफ़ा के नाम पर उनको खुदा ही मान बैठा हूं ।
मुझे दिलचस्पी है उनमे उन्हें किस्सा सुनाने मे ।।

हँसेगी देखकर दुनियां जलता घर ग़रीबों का ।
मदद करता नही कोई जरा कर्जा चुकाने मे ।।

न रिस्ते है न रिस्तों की कोई परवाह करता है ।
नही जज़्बात है क़ायम बेक़ाबू इस जमाने मे ।।

हक़ीक़त मे कहर बरपा जवां है गमसुदा आलम ।
कहाँ तकलीफ़ होती है किसी का दिल दुखाने मे ।।

मुहब्बत मे वकीली का मुझे एतराज है रकमिश । 
बहें है आँख से आंसू जरा सा गुनगुनाने में । 

                                     राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 जून 2017

मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

ग़ज़ल।। मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

वक्त काफ़ी है थोड़ा सबर कीजिये ।
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।। 

दर्द का शौक़ पाला है हमने यहाँ ।
ग़म उन्हें क्यो उनको निडर कीजिये ।। 

वक़्त रुकता नही है खुदा के लिये ।
वक्त आये तो उनको इधर कीजिये ।।

डूब जायेगे आएगा जब ज़लज़ला ।
तब तलक दर्द को बेअसर कीजिये ।।

कोई सीसा नही टूट जाए जो दिल ।
मौत वालो को कह दो ज़िगर कीजिये ।।

इस मुहब्बत मे वे भी गुनेहगार है  ।
वक्ते दर आज उनको नज़र कीजिये ।।

मंजिले पास आएगी रकमिश' तिरी ।
इश्क़ तन्हा है थोड़ा सफ़र कीजिये ।।  

                      राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...