मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।
मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।
लोग जो हम उम्र है रच रहे इतिहास कोई ।।
है नही मंज़िल कोई पर चल रहा हूँ रात दिन ।
दर्द बुनता जा रहा हूँ उम्रभर अनायास कोई ।।
रास्ते तक भी नही पर रास्ते है खुद बनाने ।
लापता होकर हँसी का कर रहा एहसास कोई ।
ज़िंदगी का ये सलीक़ा याद तो मुझको रहेगा ।
दूरियाँ मुझको मिली पर आ सका न पास कोई ।
याद मुझको आ रहा है दोस्ती का वो तजुर्बा ।
जिंदगी में प्यार का तो है नही अभ्यास कोई ।।
मंजिलें तुमको मिलेगी फ़िक्र में रकमिश वफ़ा की ।
ख़त्म हो जायेगी ख्वाबो की कोई तालाश कोई ।।
©©राम केश मिश्र