ग़ज़ल साहिल
प्रेम एक एहसास है।
सोमवार, 13 जून 2022
नशा ए इश्क
रविवार, 24 सितंबर 2017
जिंदगी मे जहर बो रहा आदमी ।
क्रोध की आग मे सो रहा आदमी ।
जिंदगी मे ज़हर बो रहा आदमी ।।
प्यार की कोई क़ीमत लगाता नही ।
दुश्मनी को लिए ढो रहा आदमी ।।
बदगुमां, बेवफा, बेरहम, बेशरम ।
जोश मे खुद ख़ुदा हो रहा आदमी ।।
दर्द देकर वफ़ा ढूढ़ता भीड़ मे ।
है अकेला मग़र खो रहा आदमी ।।
इश्क़ मे दर्द की जब दवा न मिली ।
आंसुओं से ज़ख़म धो रहा आदमी ।।
फैसला हो रहा है सबूतों के दम ।
दोगली चाल चल तो रहा आदमी ।।
दाँव पर लग गयी शाख रकमिश तिरी ।
बाखुदा बन गया जो रहा आदमी ।।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
बेबसी मे आपका भी दिल दुखाना पड़ गया ।
जिंदगी मे आपको भी आजमाना पड़ गया ।
बेबसी मे आपका भी दिल दुखाना पड़ गया ।
लग गये आने कहर बन वक़्त के वो ज़लज़ले ।
दूरियां बढ़ती रही तुमको भुलाना पड़ गया ।
ग़म भरे लम्हों मे तन्हा रुक रहा है रात भर ।
चाँदनी ढलती रही दीपक जलाना पड़ गया ।
तुम भी रोये हो अग़र तो माफ़ कर देना मुझे ।
आँसुओ को तो छिपाकर मुस्कराना पड़ गया ।
रो रहा हूं, पढ़ रहा हूं , मै तेरे किरदार को ।
आँसुओं मे आज फ़िर से डूब जाना पड़ गया ।
खेल मत ये दिल कोई टूटा खिलौना है नही ।
टूट जाएगा ज़रा ग़म का निशाना पड़ गया ।
रह गयी रकमिश अधूरी प्यार की वो ख़्वाहिसें ।
दोस्ती की चाह मे आहे लुटाना पड़ गया ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
दो दिलों की है निसानी दोस्ती ।
दो दिलों की है निसानी दोस्ती ।
हो गयी अपनी पुरानी दोस्ती ।
अश्क़ हमने मिलके पोंछे है बहुत ।
बन गयी अब जिंदगानी दोस्ती ।
रंजिशे आयी दरारें न पड़ी ।
याद बन आयी सुहानी दोस्ती ।
क़हक़हे जमने भुलाया उम्रभर ।
बन गयी मसलन कहानी दोस्ती ।
गमभरे लम्हों को आने न दिया ।
थी ख़ुसी मे आसमानी दोस्ती ।
रफ़्तरफ़्ता पास आने हम लगे ।
प्यार मे बदली सयानी दोस्ती ।
फ़ासला रकमिश दिलों का है नही ।
है सदा बेशक़ निभानी दोस्ती ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
ख़ुदी को प्यार मे झोंका नही था ।
ख़ुदी को प्यार मे झोंका नही था ।
सही है जख़्म भी खाया नही था ।।
इरादे आपके बेशक़ सही थे ।
मुझे ही इश्क़ कुछ आया नही था ।।
उनींदी आज भी आँखे हमारी ।
यक़ीनन रात भर सोया नही था ।।
शिकायत है नही दिल को किसी से ।
ज़रूरत थी कोई धोख़ा नही था ।।
मुझे मालूम थी वो बेवफ़ाई ।
तभी तो आज तक रोका नही था ।।
बढ़ा दी ख़ंजरों की धार तुमने ।
सलामत बच सकू मौक़ा नही था ।।
शहादत माँगता है इश्क़ 'रकमिश' ।
यही तो आज तक सोचा नही था ।।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
आग बदले कु बुझाना चाहिए ।
""'''''''''''''''''''""""""""""""""ग़ज़ल""""""""''''"'''""""""""""""
आग़ बदले की बुझाना चाहिए ।
हर किसी को मुस्कुराना चाहिए ।
नफ़रतों से ज़ख़्म ही मिलता सदा ।
रंजिशों को भूल जाना चाहिये ।
जिंदगी बस चार दिन की चाँदनी ।
प्यार से इसको सजाना चाहिए ।
मंज़िलों को छोड़कर दहलीज़ पर ।
फ़र्ज़ दुनियां मे चुकाना चाहिए ।
फ़र्क जिसको है नही सच झूठ का ।
आइना उसको दिखाना चाहिए ।
छोड़कर अब इश्क़ मे हैवानियत ।
दिल्लगी दिल से निभाना चाहिए ।
हो रही "रकमिश बड़ी तौहीनियां ।
अश्मिता सबको बचाना चाहिए ।
✍ रकमिश सुल्तानपुरी
मंगलवार, 19 सितंबर 2017
नमक जो देश का खाकर विदेशी पेश आता है ।
*****************ग़ज़ल****************
शराफ़त छोड़ कर सच की हँसी भरसक उड़ाता है ।
नकारा आदमी काबिज़ सभी का दिल दुखता है ।
शहर मेरा सुधर जाए ख़ुदा ऐसी इनायत कर ।
यहाँ पर आदमी दौलत पे रिश्तों को लुटाता है ।
मुहब्बत से इलाजों का असर जिन पर नही होता ।
नफ़ासत बो रहा मन मे वही रंजिश बढ़ाता है ।
हमेशा चापलूसी कर डरा है आदमीयत से ।
इमानत छोड़ लालच मे अपना सिर झुकता है ।
बसा दे न शहर यिक दिन कहीं वो बेईमानी का ।
नमक जो देश का खाकर विदेशी पेश आता है ।
ख़ुदा मेरे तुम्ही रहबर दिखा दो आइना सच का ।
मरी इंसानियत जिसकी वही ईमान गाता है ।
यही है आरजू 'रकमिश' उतर धरती पे तु आये ।
गुमानी बन वहशियत की नदी इंसां बहाता है ।
✍✍ रकमिश
रविवार, 17 सितंबर 2017
तुम्हें मालूम हो न हो ये तेरा दिल दिवाना है ।
::::::::::::::::::::::::::ग़ज़ल :::::::::::::::::::::::::
तेरा ये गमसुदा होना हक़ीक़त मे बहाना है ।
तुम्हे मालूम हो न हो ये तेरा दिल दिवाना है ।
तिरी परछाइयां तक अब अदायें पेश कर देती ।
रुकी खामोशियों मे भी ग़ज़ब मौसम सुहाना है ।
ख़ुदी दिन रात पढ़ता है तेरे चेहरे की मदहोशी ।
किसी दिन रात को आकर अदा तेरी चुराना है ।
रवायत है, अदावत है, वफ़ासत है मुहब्बत ये ।
अमानत है मिटा तन्हा ख़ुदी का दिल लुटाना है ।
पिलाती झील सी आंखे नसे मे घूँट भर आहे ।
नज़र की झील मे ख़ोकर तिरी तस्वीर पाना है ।
चलो चलते है साहिल पर करेंगे प्यार के चर्चे ।
किसी की जान ले लेगा जो तेरा मुस्कुराना है ।
नज़र के ही इशारों से ज़रा दे हौसला 'रकमिश ।
निभा रस्में मुहब्बत की तुम्हे अपना बनाना है ।
रकमिश सुल्तानपुरी
शनिवार, 16 सितंबर 2017
जिन्दगी ख़ुद की पराई हो गयी ।
दिल्लगी मे जब जुदाई हो गयी ।
जिंदगी ख़ुद की पराई हो गयी ।
मिल गयी मंजिल मुहब्बत की मुझे ।
बेसबब ग़म से मिताई हो गयी ।
दर्द के मंजर मिले प्यार मे ।
दिल्लगी मे बेवफ़ाई हो गयी ।
चाहतों पर रंजिशें थी और भी ।
बेबसी की रहनुमाई हो गयी ।
ढह गया बेशक़ घरौंदा प्यार का ।
हसरतों की भी विदाई हो गयी ।
देखकर ग़म मुस्कुराती दूर से ।
मौत भी आततायी हो गयी ।
बेदख़ल 'रकमिश' हुआ प्यार मे ।
इश्क़ मे दुनिया पराई हो गयी ।
रकमिश सुल्तानपुरी
बुधवार, 13 सितंबर 2017
आदमी आज फ़िर मुस्कुराने लगा ।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फ़र्ज़ अपना जहां मे निभाने लगा ।
आदमी आज फ़िर मुस्कुराने लगा ।
तोड़कर जाति धर्मों के बंधन सभी ।
प्यार की लौ हृदय मे जलाने लगा ।
खा रहे एक थाली मे निर्धन धनी ।
कोई रूठा तो कोई मनाने लगा ।
पुत्र परिवार का एक सहारा बना ।
मां पिता के बचन वो निभाने लगा ।
हार मे जीत मे फ़ासले न रहे ।
हौसला वो सभी का बढ़ाने लगा ।
आग़ बदले की भड़की थी संसार मे ।
एकजुटता से उसको बुझाने लगा ।
मिल रही है ख़ुसी देख रकमिश तुझे ।
अंधा लूले को राहें दिखाने लगा ।
रकमिश सुल्तानपुरी
नशा ए इश्क
ग़ज़ल नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए । जमाने से मगर उलझा न जाए । बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं, कि मुझसे और अब देखा न जाए । गरीबों ...
-
ग़ज़ल।मौत भी अपमान की ।। खिल्लियां उड़ने लगी है ऐ खुदा ईमान की । जीत अब होने लगी है बेवज़ह बेईमान की ।। मुजरिमों के लिये है इज्जतें बेशक़ रिह...
-
ग़ज़ल।मैं भी सितारा। मैं भी था सितारों में जगमगाने वालों ।। थम जाने दो आंशू गीत गाने वालो ।। अपने लब्ज़ो की बात तो बया कर दू । ...
-
ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।। गवाही की जरूरत क्या जमानत जब नजर आती । वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।। गुरु है वो , खुदा , र...