रविवार, 17 सितंबर 2017

तुम्हें मालूम हो न हो ये तेरा दिल दिवाना है ।

::::::::::::::::::::::::::ग़ज़ल :::::::::::::::::::::::::

    तेरा ये  गमसुदा  होना  हक़ीक़त  मे  बहाना  है ।
    तुम्हे  मालूम  हो न  हो ये तेरा  दिल  दिवाना है ।

    तिरी परछाइयां तक अब अदायें पेश कर देती  ।
    रुकी खामोशियों मे भी ग़ज़ब मौसम सुहाना है ।

    ख़ुदी दिन रात पढ़ता है तेरे चेहरे की  मदहोशी ।
    किसी दिन रात को आकर अदा तेरी चुराना है । 

    रवायत है, अदावत है, वफ़ासत  है  मुहब्बत ये ।
    अमानत है मिटा तन्हा ख़ुदी का दिल लुटाना है ।

    पिलाती झील सी आंखे  नसे मे  घूँट भर  आहे ।
    नज़र की झील मे ख़ोकर तिरी तस्वीर  पाना है ।

    चलो चलते है  साहिल पर  करेंगे  प्यार के चर्चे ।
    किसी की जान ले लेगा  जो तेरा  मुस्कुराना है ।

    नज़र के ही इशारों से ज़रा दे हौसला 'रकमिश ।
    निभा रस्में मुहब्बत की  तुम्हे अपना  बनाना है । 

                                 रकमिश सुल्तानपुरी



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