शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।

  ================ग़ज़ल================

    तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
    ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा  पाने  नही  निकला ।

    बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की  कोई महफ़िल ।
    दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा पाने नही  निकला ।

    झलक भर देख लेने से  दिवाना मत समझ  लेना ।
    गुमानी  कमसिनों की मै अदा पाने  नही निकला ।

    पुराने  हो गये  मसले  मग़र  हर  जख़्म  ताज़ा है ।
    मुझे  हर दर्द  मालुम है  दवा  पाने  नही  निकला ।

    नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज भी दिल में ।
    तड़पता ऱोज दिल है पर मज़ा पाने  नही निकला ।

    मुज़रिम  हूँ,  दिवाना  हूँ , बेगाना हूँ , आवारा  हूँ ।
    मारा  हूँ  मुक़द्दर  का  सजा  पाने  नही  निकला ।

    पता साहिल  का लेने ख़ुद गमों के  कारवां  आते ।
    मुहब्बत का  मसीहा हूं  ख़ुदा पाने  नही  निकला ।

    चला आया हूँ 'रकमिश'मैं लुटाने प्यार की दौलत ।
    मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने  नही निकला ।

                .             @राम केश मिश्र

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