----------------ग़ज़ल-----------------
वफ़ा की राह जो चलता रहा है ।
जमाने को वही ख़लता रहा है ।
फ़रिश्ते को लगी है ठोकरें खुब ।
ग़मो मे भी मग़र बढ़ता रहा है ।
मिली तनहाइयां सच को यहाँ पर ।
अमादा झूठ वो पलता रहा है ।
मुहब्बत मे फिरौती हो रही अब ।
जुबां से चुप कोई लुटता रहा है ।
कमीनों के लिए बरपी वफ़ाई ।
दिवाना रात भर मरता रहा है ।
गुनाहों के लिए बेशक़ रिहाई ।
इमानत को क़ज़ा मिलता रहा है ।
जमाना दोगला "रकमिश सताता ।
शहादत मांगता छलता रहा है ।
रकमिश सुल्तानपुरी
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