बुधवार, 13 सितंबर 2017

ज़माने को वही ख़लता रहा ।

----------------ग़ज़ल-----------------

      वफ़ा  की  राह जो  चलता  रहा है ।
      जमाने  को  वही  ख़लता  रहा  है ।

      फ़रिश्ते  को  लगी है  ठोकरें  खुब ।
      ग़मो मे  भी   मग़र   बढ़ता रहा  है ।

      मिली तनहाइयां सच को यहाँ  पर ।
      अमादा  झूठ   वो  पलता  रहा  है ।

      मुहब्बत  मे  फिरौती हो  रही  अब ।
      जुबां से  चुप कोई  लुटता  रहा  है ।

      कमीनों   के   लिए  बरपी  वफ़ाई ।
      दिवाना   रात  भर  मरता  रहा  है ।

      गुनाहों  के   लिए   बेशक़   रिहाई ।
      इमानत को क़ज़ा मिलता  रहा  है ।

      जमाना दोगला "रकमिश  सताता ।
      शहादत   मांगता  छलता  रहा  है ।

                      रकमिश सुल्तानपुरी

                     

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