दिल्लगी मे जब जुदाई हो गयी ।
जिंदगी ख़ुद की पराई हो गयी ।
मिल गयी मंजिल मुहब्बत की मुझे ।
बेसबब ग़म से मिताई हो गयी ।
दर्द के मंजर मिले प्यार मे ।
दिल्लगी मे बेवफ़ाई हो गयी ।
चाहतों पर रंजिशें थी और भी ।
बेबसी की रहनुमाई हो गयी ।
ढह गया बेशक़ घरौंदा प्यार का ।
हसरतों की भी विदाई हो गयी ।
देखकर ग़म मुस्कुराती दूर से ।
मौत भी आततायी हो गयी ।
बेदख़ल 'रकमिश' हुआ प्यार मे ।
इश्क़ मे दुनिया पराई हो गयी ।
रकमिश सुल्तानपुरी
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