शनिवार, 2 सितंबर 2017

दर्द के ऐसे निवाले पल रहे है आज़कल ।

   ग़ज़ल । दर्द के ऐसे निवाले पल रहे है आज़कल ।

    सादगी मे  लोग  बेशक़ ढल रहे  है  आज़कल ।
    बेवफ़ाई  पर  यक़ीनन कर  रहे  है  आजकल ।

    झूठ की  दुनियां  बसाकर लूटने  की  साजिशें ।
    अश्क़ आंखों मे किसी के भर रहे है आज़कल ।

    रहनुमां  खूंखार   बाग़ी  मतलबी  बेईमान   से ।
    दे दख़ल हर जिंदगी मे  ख़ल रहे है  आज़कल ।

    आम जनता  नींद मे  बस  चल  रही है  रास्ता ।
    जागती  क़ानूनी  रश्में  गल  रही हैं  आज़कल ।

    बेबसी मे  जी  रहे  जो  इक  उजाले  के  लिए ।
    रात अंधेरी  उन्हें  भी  छल  रही  है  आज़कल । 

    आशिकों मे भर  रहा  है  वक़्त भी  हैवानियत ।
    प्यार की रश्में जहां मे  मर  रही  है  आज़कल ।

    मौत "रकमिश" हो गयी सस्ती यकीं तू मान ले ।
    दर्द  के  ऐसे  निवाले  पल  रहे   है  आज़कल । 

                              राम केश मिश्र
                         सुलतापुर उत्तर प्रदेश

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