सोमवार, 11 सितंबर 2017

दग़ा देने मुहब्बत के बहाने लोग निकले है ।

================ग़ज़ल=================

   दुनियां  के  रिवाजों को  भुलाने  लोग   बैठे   है ।
   नये ज़ख़्मो को देखो फ़िर दुखाने  लोग  बैठे  है ।

   ढहा रिश्तों कि दीवारें  वफ़ा की  खा रहें क़समें ।
   जुबां   मे  ख़ंजरों  को  ले  पुराने   लोग  बैठे  है ।

   बिकाऊँ हूं नही फिर भी बिका महसूस करता हूं ।
   ख़ुदा की भी यहाँ  क़ीमत  लगाने  लोग  बैठे  है ।

   भरोसा उठ गया  जबसे  यहां  हैवानियत  बरपी ।
   भरे   आँखों   मे  आंसू   को  छिपाने  लोग  बैठे ।

   नतीज़े आ रहे  बेशक़  रुआँसा  आदमी  मिलता ।
   सज़ा अपनी नफ़ासत का  चुकाने  लोग  बैठे  है ।

   रहेगा  ग़र   यही  मंज़र   बचेगा  आदिमा   हरसूं ।
   अभी   से  ग़मभरे  किस्से  सुनाने  लोग  बैठे  हैं ।

   कहां तक मै लिखू रकमिश कमीनी दास्ताँ इनकी ।
   दग़ा    देने   मुहब्बत   के  बहाने   लोग   बैठे   है । 

                           रकमिश सुल्तानपुरी

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