मंगलवार, 19 सितंबर 2017

नमक जो देश का खाकर विदेशी पेश आता है ।

*****************ग़ज़ल****************

  शराफ़त छोड़ कर सच की हँसी भरसक उड़ाता है ।
  नकारा आदमी काबिज़  सभी का  दिल  दुखता है ।

  शहर  मेरा  सुधर  जाए  ख़ुदा  ऐसी  इनायत  कर ।
  यहाँ पर आदमी  दौलत पे  रिश्तों  को  लुटाता  है ।

  मुहब्बत से इलाजों का असर  जिन पर नही होता ।
  नफ़ासत बो  रहा  मन मे  वही  रंजिश  बढ़ाता  है ।

  हमेशा   चापलूसी  कर   डरा  है   आदमीयत  से ।
  इमानत  छोड़  लालच मे अपना  सिर  झुकता  है ।

  बसा दे न शहर  यिक दिन कहीं  वो बेईमानी  का ।
  नमक जो देश का  खाकर  विदेशी  पेश  आता है ।

  ख़ुदा मेरे तुम्ही रहबर  दिखा  दो आइना  सच का ।
  मरी   इंसानियत   जिसकी  वही  ईमान  गाता  है ।

  यही है  आरजू  'रकमिश' उतर धरती  पे तु  आये ।
  गुमानी  बन  वहशियत  की नदी  इंसां  बहाता  है । 

                              ✍✍ रकमिश

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