रविवार, 24 सितंबर 2017

बेबसी मे आपका भी दिल दुखाना पड़ गया ।

     जिंदगी मे आपको  भी  आजमाना  पड़  गया ।
     बेबसी मे आपका भी दिल दुखाना  पड़  गया ।

     लग गये आने कहर बन वक़्त के वो ज़लज़ले ।
     दूरियां बढ़ती रही  तुमको  भुलाना  पड़  गया ।

     ग़म भरे लम्हों मे तन्हा  रुक  रहा है  रात  भर ।
     चाँदनी ढलती रही  दीपक जलाना  पड़  गया । 

     तुम भी रोये हो अग़र तो माफ़ कर  देना  मुझे ।
     आँसुओ को तो छिपाकर मुस्कराना पड़ गया ।

     रो रहा हूं, पढ़  रहा  हूं  , मै  तेरे  किरदार  को ।
     आँसुओं मे आज  फ़िर से डूब जाना पड़ गया ।

     खेल मत ये  दिल  कोई  टूटा खिलौना है  नही ।
     टूट जाएगा  ज़रा  ग़म  का निशाना  पड़  गया ।

     रह गयी रकमिश अधूरी प्यार की वो ख़्वाहिसें ।
     दोस्ती   की  चाह  मे  आहे  लुटाना  पड़  गया । 

                                 ✍रकमिश सुल्तानपुरी
                    

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