गुरुवार, 16 जून 2016

ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही।

    ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

बेजुबां बन सर कटाना है शहादत तो नही ।
ज़ालिमों सा मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

लाख़ हो बंदिश सज़ा ऐ मौत खुद हो सामने ।
बढ़ चलेगे शान से कुछ खूबसूरत तो नही ।।

चुपके चुपके चल रही है देश में कुछ साजिशें । 
काले धन पर ही नजर है ये हक़ीक़त तो नही ।?

बिक रहा है दौलतों से अब यहा ईमान देखो ।
घूस लेकर मुस्कुराना भी शराफ़त तो नही ।।

है छुपे गद्दार अपने देश में इनको निकालो ।
चुपके चुपके कर रहे होंगें हुकूमत तो नही ।?

साफ़ सुथरी नीति में आज भी धोख़ा छिपा है।
है बहुत अड़चन बदलने की जरूरत तो नही ।?

जाने दो'रकमिश'यहा के लोग है क़ायल बहुत ।
हो गयी है चलबाजों से मुहब्बत तो नही ।? ।

                  राम केश मिश्र'रकमिश'

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