गुरुवार, 16 जून 2016

ग़ज़ल।मेरी आदत तो नही।

          ग़ज़ल।ये मुहब्बत तो नही ।

आपसे बेहतर कोई भी खूबसूरत तो नही ।
तुम वफ़ा ही करोगे ये हक़ीक़त तो नही ।।

जिंदगी के मोड़ पर मिल गये तो क्या हुआ ।
ये महज़ इत्तफ़ाक़ है कोई मुहूरत तो नही ।।

देखकर तेरी शरारत बढ़ गयी खामोशियां ।
लम्हा लम्हा गमसुदा हूँ ये मुहब्बत तो नही ।।

बेरुख़ी से टूटकर खुद तन्हा तन्हा जी रहा हूँ ।
बेवज़ह दिल तोड़ने की अब ज़रूरत तो नही ।। 

हर किसी से दोस्ती ,प्यार दू मुमकिन कहाँ  ।
कर वफ़ा बदनाम कर दू मेरी आदत तो नही ।।

बड़ रहीं है बेसक मुहब्बत में तेरी फरमाइशें  ।
दिल के बदले यार मुझ पर ही हुकूमत तो नही ।।

है मुझे मंजूर 'रकमिश' गम भरी तनहाइयां । 
दर्द के झोंके सही कोई मिलावट तो नही ।। 

                          ©राम केश मिश्र'रकमिश' 

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