रविवार, 12 जून 2016

ग़ज़ल।दिवाने को नही मालुम।

ग़ज़ल।निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।

वफ़ा में जख़्म पाया हूँ ज़बाने को नही मालुम ।
निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।।

नही होती मुहब्बत में यहा ज़ख्मो की भरपाई ।
मिली है ज़िंदगी किस पर लुटाने को नही मालुम ।

यक़ीनन नफ़रतों में भी उसे साज़िश लगी होगी ।
ग़मो में काम आयी हो भुलाने को नही मालूम ।।

हुआ जो दर्द तो आँखे छिपाकर क्या करें आंसू ।
मिला हो एक पहलू भी छिपाने को नही मालुम । 

जवां वो ,थी हसीं वो थी ,बसी वो थी निगाहो में ।
पर आयी हो कभी तन्हा मिटाने को नही मालुम ।।

मुझे तकलीफ़ तो न थी मग़र हालात से बेबस ।
चला आया तपिस का गम बुझाने को नही मालुम ।

मुझे मालूम था 'रकमिश' मुहब्बत भी बिकाऊ है ।
मग़र दर्दो के अफ़साने भुलाने को नही मालूम ।। 

                            © राम केश मिश्र'रकमिश'

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