गुरुवार, 2 जून 2016

ग़ज़ल।मुझको शिफ़ारिश न मिली।

        ग़ज़ल।मुझको। सिफ़ारिश न मिली ।

आज तक मेरे प्यार को बेसक गुज़ारिश न मिली ।
फ़ासला था नाम का फिर भी सिफ़ारिश न मिली । 

आये इलाजे इश्क़ की बनकर दवा इस जिंदगी में ।
चार दिन रौनक रही फ़िर कोई नुमाइश न मिली ।

एकटक नज़रों के बदले दे गये तनहाइयां फ़िर ।
दर्द का हिस्सा मिला यांदें निख़ालिश न मिली ।। 

बेवज़ह आँखों का मेरे जुल्म साबित हो चुका था ।
फ़ैसला उनको मिला मुझको सिफ़ारिश न मिली ।

एक दिल था ,एक उनके थी अदाओं की काशिस ।
एक तरफ़ा प्यार में कुछ आजमाइस न मिली । 

रौंदकर मेरी चाहतों को खो गये हमआम बनकर ।
मंजिलें लाखों मिली पर एक ख़्वाहिश न मिली ।।

आज भी गर्दिश है'रकमिश' तू नही तो कुछ नही  ।
प्यार में ढूढ़ा बहुत पर चाहत लवारिश न मिली ।।

                             ©राम केश मिश्र'रकमिश'

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