गीतिका।बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।
आदमी हर बात को ढोने लगा है ।
झूठ सच का फासला खोने लगा है ।।
प्यार के लायक नही जो प्यार में ।
दोस्ती से हाथ भी धोने लगा है ।।
फ़र्ज़ की सब बंदिशें खुद तोड़कर ।
बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।।
क़द्र रिस्तो की न जिसने की कभी ।
है अकेला, आज वो रोने लगा है ।।
प्यार का दीपक जलाना भूलकर ।
नफ़रतों का जहर बोने लगा है ।।
वक्त से लड़ना है असली ज़िंदगी ।
जाग"रकमिश"तू कहाँ सोने लगा है ।
राम केश मिश्र(रकमिश)
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