गुरुवार, 26 मई 2016

गज़ल।बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।

    गीतिका।बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।

आदमी हर बात को ढोने लगा है ।
झूठ सच का फासला खोने लगा है ।।

प्यार के लायक नही जो प्यार में ।
दोस्ती से हाथ भी धोने लगा है ।।

फ़र्ज़ की सब बंदिशें खुद तोड़कर ।
बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।।

क़द्र रिस्तो की न जिसने की कभी ।
है अकेला, आज वो रोने लगा है ।।

प्यार का दीपक जलाना भूलकर ।
नफ़रतों का जहर बोने लगा है ।।

वक्त से लड़ना है असली ज़िंदगी ।
जाग"रकमिश"तू कहाँ सोने लगा है ।

                           राम केश मिश्र(रकमिश)

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