शुक्रवार, 13 मई 2016

ग़ज़ल।जमानत तो मिलेगी ही ।

      ग़ज़ल।ज़मानत तो मिलेगी ही ।

रहोगे नेक दिल बेशक़ इमानत तो मिलेगी ही ।
करारा जख़्म होगा पर अमानत तो मिलेगी ही ।

ग़मे ग़र्दिश हकीक़त मे ख़ता तारीफ़ की ख़्वाहिश ।
वफ़ा की रहनुमाई में ज़लालत तो मिलेगी ही ।

बड़ी नायाब होती है अदाओं की गिरफ़्तारी ।
निग़ाहें बर्क़ रखो तुम शरारत तो मिलेगी ही ।

बहुत हो दूर मंजिल पर चले बेबाक़ तुम जाओ ।
लगेंगे ग़म भरे झोंके हरारत तो मिलेगी ही ।

शिकारी हो रहा देखो यहा हर शख़्स रंजिस में ।
साज़िश हो रही उसकी वकालत तो मिलेगी ही ।

अग़र है आदमी सच्चा अदालत क्या गवाही क्या ।
भले हो क़ैद दो इक दिन ज़मानत तो मिलेगी ही ।

अभी रमज़ान है "रकमिश" निगाहें रख रहीं रोज़ा ।
रहम लाएगा खुद मौला इनायत तो मिलेगी ही ।

                            राम केश मिश्र(रकमिश)

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