शनिवार, 30 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत अब नही होती।

           ग़ज़ल।मुहब्बत अब नही होती ।

ग़मो के बढ़ गये आलम शहादत अब नही होती ।
यकीं मानो निगाहों तक मुहब्बत अब नही होती ।।

वही साकी वही हमदम वही हमराह हमदिल हैं ।
वही दर्दो के पैमाने शरारत अब नही होती ।।

कहूँ क्या हाल मैं तुमसे निग़ाहों की तबाही का ।
लुटा हर बार महफ़िल में शिकायत अब नही होती ।।

बड़ी तकलीफ़ देती थी पुरानी दर्द तन्हाई ।
वही लम्हें बेक़ाबू पर हरारत अब नही होती ।।

कभी हमआम थे हम भी मुहब्बत के ईशारों से ।।
मग़र बदनाम करने की आदत अब नही होती ।।

किसी के दिल के ज़ख्मो की दवा कैसे करेंगे अब ।
अपने दिल खुद मुझसे हिफ़ाजत अब नही होती ।।

सजाएँ मौत थी सस्ती तेरे 'रकमिश ,खफाई से ।
मिली है बादसाहत पर हुकूमत अब नही होती है ।।

                          राम केश मिश्र(रकमिश)

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