शनिवार, 9 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।यहा शोहरत नही मिलती ।

      ग़ज़ल।यहाँ शोहरत नही मिलती ।

रदीफ़--नही मिलती
काफ़िया--राहत चाहत शोहरत फुरसत आदि

मतला--
मिलेगी दर्द की महफ़िल कभी चाहत नही मिलती ।
दवा हर मर्ज की हाजिर मग़र राहत नही मिलती ।

शेर--
मिला जो रहनुमाई में तजुर्बा बेअसर निकला ।
मुहब्बत में तजुर्बो को यहाँ शोहरत नही मिलती ।

ज़रा सोचो करोगे क्या मेरे इस गम के हिस्से का ।
तुम्हे तो गैर के शाये से ही फ़ुरसत नही मिलती ।।

रहूँ ख़ामोश मज़बूरन मुहब्बत मत समझ लेना ।
बयां कर दूँ हक़ीक़त तो यहाँ इज्जत नही मिलती ।

किसी मासूम दिल पर क्यों लुटा दू ग़म का ये तूफाँ ।
लगा दू आग़ खुशिओं में lदिले हसरत नही मिलती ।।

न देखो आँख के आँसू सितम होगा तो निकलेगे   ।
वफ़ा पाया नही फ़िर भी यहा नफ़रत नही मिलती ।।

मकता--
निगाहें प्यार की "रकमिश" चुराता था कि आदी था ।
अब तो आँख के आँशू से ही मोहलत नही मिलती ।।

                   राम केश मिश्र"रकमिश"

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