ग़ज़ल खुद को मिटाया तो नही जाता ।
मुहब्बत में किया वादा निभाया तो नही जाता ।
वफ़ा की चाह में दिल को दुखाया तो नही जाता ।।
चलो हम मान लेते है कि हम ही बेवफ़ा निकले ।
मग़र ये प्यार का लम्हा बिताया तो नही जाता ।।
तुम्हे भी याद होगें वो तेरे मासूमियत के दिन ।
बहे जो आँख के पानी छुपाया तो नही जाता ।।
गये जब छोड़ मुझको तुम किसी के आशियाने में ।
करूँ मैं लाख़ कोशिस पर भुलाया तो नही जाता ।।
करेगा फ़ैसला इक दिन खुदा खुद की अदालत में ।
वफ़ा का दाम दुनिया में चुकाया तो नही जाता ।।
सहेंगे ग़म के खंजर तक तुम्हारे इश्क़ में बेसक ।
मग़र हर बार ही खुद को मिटाया तो नही जाता ।।
मुझे मालूम था इक दिन लुटेगी दिल की ये महफ़िल ।
वफ़ा के नाम पर सब कुछ लुटाया तो नही जाता ।।
तुम्हे जाना है रकमिश' तो चले जाओ सकूँनत में ।
लगी जो आग दिल में तो बुझाया तो नही जाता ।।
© राम केश मिश्र (रकमिश)
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