शनिवार, 23 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।किसी का दिल दुखाने तक।

      ग़ज़ल।किसी का दिल दुखाने तक।

रदीफ़--तक ।
काफ़िया--निसाने,फ़साने,जलाने,घराने आदि ।

मतला--
दफ़न होंगे ज़बाने में गुनाहों के निसाने तक ।
हक़ीक़त की जुबाँ होगी बयां होंगे फ़साने तक ।।

शेर--
मसालें रंज की नफ़रत बुझाकर देख ऐ हमदम ।
खुदा हासिल जरू होगा वफ़ा की शै जलाने तक ।।

ज़िगर नापाक न हो तो ग़रीबी क्या अमीरी क्या ।
वरना ख़ाक़ ही बचता निसां उनके घराने तक ।।

क़सम खाकर करो वादे सुकूने इश्क़ से पहले ।
मग़र यूँ तोड़ मत डालो इसे हरगिज़ निभाने तक ।।

कमाई ज़िंदगी हमने बड़े ही नेक करतब से ।
गवां देते मग़र बेसक बची दौलत कमाने तक ।।

इलाही की इबादत से मिला दो चार दिन ही है ।
मुहब्बत बाट कर जाना ज़बाने में बुलाने तक ।।

रचाकर मौत की साज़िस बुराई जीतती आयी ।
बुरा होना तो मत होना किसी का दिल दुखाने तक ।

मकता--
लगा जो आग़ हँसते है कभी गैरों के घर रकमिश ।
जलेंगे एक दिन मसलन उनके आशियाने तक  ।।

                        ©राम केश मिश्र(रकमिश)

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