बुधवार, 6 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।दिवाने रोज़ आते है।

         ग़ज़ल ॥दिवाने रोज आते है ।

निगाहें प्यार में सपने सुहाने रोज आते है ।
यहाँ साहिल की महफ़िल में दिवाने रोज आते है ।

हुये नाक़ाम बेबस है दिलों को चाहने वाले ।
लगा जो प्यार में ठोकर भुलाने रोज आते है ।

बिछड़कर दर्द के मारे सकूने फ़र्ज़ के ख़ातिर ।
मिली जो इश्क़ की क़ीमत चुकाने रोज़ आते है ।

भले हैं अज़नबी लेकिन बड़े ही नेक दिल वाले ।
किया हरहाल में वादा निभाने रोज़ आते है ।

अग़र मौक़ा मिले तुम भी चले आवो गुजारिस है ।
वफ़ा में बेवफा अक़्सर पुराने रोज़ आते है ।

बनेगा अज़नबी कोई तेरे दिल का मसीहा भी ।
अभी तो आप जैसे दिल दुखाने रोज आते है ।

कभी"रकमिश"दिखायेंगे दिलों के जख़्म तुमको भी । 
खुदी के ग़म में डूबे हम नहाने ऱोज आते है ।। 

                             राम केश मिश्र(रकमिश)

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