बुधवार, 18 मई 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा होकर।

         ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा होकर।

बनी गम की निसानी जब तमन्ना वो वयाँ होकर ।
मिटा दी जिंदगी बेशक़ मुहब्बत मे रवाँ होकर ।

मिला मासूम जो चेहरा निगाहों की शरारत से ।
खिली हसरत बेक़ाबू बन अदाओ में जवां होकर ।

हवाओं में ,फिज़ाओ में ,निग़ाहों में ,अदाओं में ।
वो आती सामने मेरे मुहब्बत की दवा होकर ।

उठी ग़र्दिश में ज़ो रौनक सजाने के लिये दिल को ।
जलाने वो लगी मुझको ज़ख्मो पर लवा होकर । 

उठे जब क़हक़हे नफ़रत नज़ाक़त में नसीहत बन । 
पुरानी दर्द तन्हाई उभरती तब हया होकर ।

कि "रकमिश'आज तक तूने जलाया सिर्फ़ दिल मेरा ।
कभी तो हमनवां होकर कभी दर्द-ऐ-हवा होकर ।

                                ©राम केश मिश्र

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