गीतिका
मुझको ख़ुद का प्यार समझ ले ।
बिन कांटो का हार समझ ले ।।
टूट गया तो गया काम से ।
इकतारा का तार समझ ले ।
दिल को तेरे परख रहा हूं ।
चाहे अत्याचार समझ ले ।।
एहसासों का रूप बनाता ।
भावों का सृंगार समझ ले ।
सन्देहों की जाल बिछाकर ।
डूब रहा मझधार समझ ले ।
डरा हुआ हूं ख़ामोशी से ।
डर को मेरी हार समझ ले ।।
मुस्कानों की एक अदा पर ।
बेशक़ हूं बीमार समझ ले ।।
रकमिश तेरा हुआ दिवाना ।
चाहे तो बेकार समझ ले ।।
रकमिश सुल्तानपुरी
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