रविवार, 18 जून 2017

ग़ज़ल।तगादे आ रहे घर तक ।

________________________________
           @ग़ज़ल ।तगादे आ रहे घर तक ।@

लिया क़र्ज़ा रक़ीबों से अमादे आ रहे घर तक ।
ग़रीबी  की  दशा देखो तगादे आ रहे घर तक ।। 

ख़बर उनको मिली शायद गया बाज़ार कुछ लेने ।
न पाया काम पर देरी  से सादे  आ रहे घर तक ।।

शहर की हर दुकानों पर मिरी तौहीनियाँ कहकर ।
किये  ग़ुस्से  को  बेक़ाबू  खरादे आ रहे घर तक ।।

पड़ी  फ़टकार सुनता मै  किये  बेबाक़  सर नीचे ।
मिरी इज्ज़त को पैरों तल हि रौंदे आ रहे घर तक ।। 

चिरागों तक नही जलते की उनके घर अंगीठी है ।
मिरे  जितने के कर्ज़े  के  बुरादे आ रहे घर  तक ।।

लगा बेशक़ हुजूमी से मिरे जज़्बात को धक्का ।
जुबां के ख़ंजरों से दिल कुरेदे आ रहे घर तक ।।

मुझे मनहूस सी लगती ख़ुदी की जिंदगी रकमिश ।
बुरे ख्यालों से  बोझिल से इरादे आ रहे घर  तक ।।

                              राम केश मिश्र

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...