मंगलवार, 27 जून 2017

वक्त मिलता नही आदमी को कभी ।

ग़ज़ल
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
रुक्न-गालगा
गालगा गालगा गालगा गालगा ।
अरकान-फ़ायलुन  फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन

212         212     212   212 
ढूढ़ता  कौन  है  जिंदगी  को  कभी ।।
वक़्त मिलता नही आदमी को कभी ।। 

ज़ख़्म गैरो के नासूर करता रहा ।
चाह इसको नही सादगी को कभी ।।

शौक़ का दे हवाला किया पाप है ।
ढूढ़ पाता नही रोशनी को कभी ।।

चल पड़े है अँधेरा मे सुनसान है ।
प्यार देता नही अज़नबी को कभी ।।

लाख़ महफ़िल सजी दिल के सौदे हुए ।
वो न समझा यहाँ दिल्लगी को कभी ।।

रात लेती रही खुब मज़ा चाँद का ।।
रोशनी न मिली चाँदनी को कभी।।

                            राम केश मिश्र

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...