सोमवार, 12 जून 2017

फ़ासला बढ़ता रहा ।

  -----------फ़ासला बढ़ता रहा ------------

दोस्तों का ज़िन्दगी भर दाख़िला बढ़ता रहा ।
दास्ताँ सुनकर वफ़ा की हौसला बढ़ता रहा ।। 

फ़ायदे की लाख़ कोशिश मे गवाँ दी जिंदगी ।
उम्रभर बस दर्द का सिलसिला बढ़ता रहा ।। 

हो गये सब ख़ाक अरमां छा गये बनके धुआँ ।
गर्दीशे तूफ़ान का इक ज़लज़ला बढ़ता रहा ।।

मुजरिमों के साथ मुज़रिम आईना बारूद का ।
हमवफ़ा की आरजू रख जो मिला बढ़ता रहा ।।

बावफ़ा की साख़ पर फिर आतिशों के ढ़ेर से ।
ज़ल गयी ज़ागीर दिल की मनचला बढ़ता रहा ।।

आफ़तों से बच नही पायी है दुनियां ये कभी ।
वक़्त दर तारीख़ दर फिर ग़िला बढ़ता रहा ।। 

मिट गये होते जहां के फ़लसफे रकमिश सभी ।
ज़िन्दगी से मौत का बस फ़ासला बढ़ता रहा ।।

                                    राम केश मिश्र

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...