गुरुवार, 15 जून 2017

वतन के लिए ।

                       ग़ज़ल

ज़िन्दगी मेरी अर्पण वतन के लिए ।।
जान जाये तो अरि के दमन के लिए ।।

सांस चाहे भले हो मिरी आखिरी ।
मै जिऊंगा निख़ालिश चमन के लिए ।।

लाख़ गर्दिश वहां चाहे वीरान हो ।
पर तिरंगा रहेगा क़फ़न के लिए ।।

देश की शान तो है मिरी जिंदगी ।
मैं मिटाता रहूं हर जनम के लिए ।।

एक दुश्मन सलामत रहेगा नही ।
चीर सीने को दूंगा करम के लिए ।।

वक्त आएगा रकमिश कभी तो तिरा ।
पैर पीछे ना जायें परन के लिऐ ।।

                           राम केश मिश्र

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