सोमवार, 3 जुलाई 2017

किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

बहर-हजज़ मुसम्मन सालिम
अरकान -मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन
रदीफ़ -रह गए सबको ।
क़ाफ़िया -आते
वज़्न-1222     1222    1222     1222
     ग़ज़ल। किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

   कुरेदा जख़्म महफ़िल मे दिखाते रह गए सबको ।
   जफ़ा ऐ इश्क़ का किस्सा सुनाते रह गए सबको ।।

   सकूनत की दवा ख़ातिर महज़ इक आह काफ़ी थी ।
   कोई ढाढ़स नही  देता  बुलाते  रह  गए  सबको ।।

   मिला न एक भी बन्दा मिरा दिल थाम लेने को ।
   उम्रभर आशिकी मे हम मिलाते रह गए सबको ।।

   मुझे ही क्यों मील  लम्हे  भरे  गम  बेहयाई  से ।
   वफ़ा की राह फ़ुर्सत से दिखाते रह गए सबको ।।

   मिली हर बार मुझको ही न जाने बेवफ़ाई  क्यो ।
   दिलों की क़ीमती दौलत लुटाते रह गए सबको ।।

   बड़ी मुद्दत से मिलती है जहाँ में प्यार में ख़ुशियां ।
   बताते रह गए सबको ,  मनाते  रह गए  सबको ।।

   छुपाकर आंख मे आँसू भले रोया था मैं रकमिश ।
   ग़मो के ज़लज़लों मे भी हँसाते रह गए सबको ।। 

                          राम केश मिश्र 

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