रविवार, 9 जुलाई 2017

मुहब्बत आपकी देखा नही था ।


बहर- हज़ज मुसद्दस महजूफ़
वज़्न-- 1222 /1222 /122
अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
काफिया- ना
काफ़िया के स्वर- आ
रदीफ़ --- नहीं था
क्वाफी- देखा, चाहा, सोचा, पाया, धोक़ा, सोया, 

मुहब्बत आपकी  देखा  नही था ।
सही है जख़्म भी खाया नही था ।।

इरादे   आपके   बेशक़  सही  थे ।
मुझे ही इश्क़ कुछ आया नही था ।।

उनींदी आज भी  आँखे  हमारी ।
यक़ीनन रात भर सोया नही था ।।

शिकायत है नही दिल को किसी से ।
ज़रूरत थी  कोई  धोख़ा  नही  था ।।

मुझे   मालूम   थी  वो    बेवफ़ाई ।
तभी तो आज तक रोका नही था ।।

बढ़ा दी  ख़ंजरों  की  धार  तुमने ।
सलामत बच सकू मौक़ा नही था ।।

शहादत माँगता है इश्क़ 'रकमिश' ।
यही तो आज तक सोचा नही था ।। 

                  @राम केश मिश्र
                सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश


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